उत्तराखंड सरकार द्वारा बीते 23 अक्तूबर को अल्मोड़ा में हुई कैबिनेट बैठक में राज्य की जल नीति पेश किए जाने पर जल, जंगल एवं जमीन के मुद्दों पर कार्य कर रहे सामाजिक संगठनों ने हर्ष जताया है। वर्ष 2003 में लोक जल नीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान के प्रमुख सुरेश भाई ने कहा कि सरकार द्वारा तैयार जल नीति का अध्ययन करने के बाद ही इसके नफा नुकसान का पता चल पाएगा।
पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने कहा कि उत्तराखंड की जनता दशकों से जल, जंगल एवं जमीन पर अधिकार के लिए संघर्षरत है। अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने के कारण सूबे की जनता स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रही थी। वर्ष 2002 में राष्ट्रीय जल नीति घोषित होने के बाद उत्तराखंड में भी अलग जल नीति की उम्मीद थी। तब वर्ष 2003 में उत्तराखंड में जल, जंगल एवं जमीन के मुद्दों को लेकर कार्य कर रहे 150 से अधिक जन संगठनों ने गांव-गांव घूमकर उत्तराखंड के लिए लोक जल नीति का मसौदा तैयार किया था। लेकिन तब से सरकारों ने इस पर मौन साध रखा था। अब 23 अक्तूबर को अल्मोड़ा में हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने राज्य की जल नीति पेश की है। इसके लिए सरकार धन्यवाद की पात्र है।