मकर संक्रांति के पावन पर्व पर काशी विश्वनाथ की नगरी में देव डोलियों तथा बाड़ाहाट क्षेत्र के पांडव नृत्यों की धूम रही। माघ मेले के लिए उत्तरकाशी पहुंचे पाटा, संग्राली, बग्यालगांव, लक्षेश्वर, गंगोत्री क्षेत्र के ग्रामीणों ने नगर के चौक चौराहों पर देव डोलियों के साथ पारंपरिक रांसो नृत्य कर क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति की झलक प्रस्तुत की।
चमाला की चौरी पर गांव के बुजुर्गों ने बाड़ाहाट के थौलु की यादें साझा कीं।
वर्ष 2012 और 2013 की आपदा के बाद दो साल तक जिला पंचायत की ओर से माघ मेले का आयोजन नहीं किया गया था। तब पाटा, संग्राली, बग्यालगांव, लक्षेश्वर, गंगोरी एवं बाड़ाहाट क्षेत्र के ग्रामीणों ने पुन: बाड़ाहाट का थौलु की परंपरा को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया था।
बीते तीन सालों की भांति इस बार भी मकर संक्रांति पर शुक्रवार को ग्रामीण क्षेत्र के आराध्य कंडार देवता की डोली की अगुवाई में उत्तरकाशी पहुंचे। जड़भरत घाट पर देवता के साथ पांडव पश्वा एवं ग्रामीणों ने गंगा स्नान किया।
यहां पांडवों के अस्त्र शस्त्रों की पूजा कर डोली के साथ शोभा यात्रा मेला प्रांगण तथा काशी विश्वनाथ समेत अन्य मंदिरों से होते हुए भैरवचौक स्थित चमाला की चौरी पर पहुंची।
इस मौके पर पांडव पश्वा गणेश भट्ट, सुखशर्मानंद नौटियाल, पदम सिंह, मुकेश बलूनी, दिनेश डंगवाल, अमर सिंह, महेंद्र नेगी, शिवानंद भट्ट, कमल सिंह, कुंती देवी, बाजगी मदन लाल, मक्खन लाल, शेर दास तथा पालिकाध्यक्ष जयेंद्री राणा, अजय पुरी, शिवराम डंगवाल, द्वारिका प्रसाद, पवन भट्ट, दामोदर सेमवाल, कामेश्वर भट्ट, कमल लाल, राजेंद्री देवी, प्यारेलाल शाह, सुनीता भट्ट, संतोष सेमवाल, विनोद नेगी, सुरेंद्र पुरी, हरीश डंगवाल आदि मौजूद रहे।
पारंपरिक स्वरूप को संजोने की जरूरत
संग्राली गांव के चंद्र मोहन भट्ट (75), कीर्तिमणि नौटियाल (70) ने बताया कि पहले बाड़ाहाट का थौलु तिब्बत के साथ व्यापार और इन्हीं धार्मिक परंपराओं का सम्मिलित स्वरूप था।
यह स्नान पर्व मकर संक्रांति से शुरू होकर तीन दिन तक चलता था। बाड़ाहाट में रहने वालों के घरों से चावल एकत्र का खिचड़ी का प्रसाद बनाया जाता था। तीन सालों से यह परंपरा पुन: शुरू होना अच्छा संकेत है।