जाड जनजाति, हिंदू एवं बौद्ध धर्म की साझी संस्कृति वाले तिब्बती मूल के स्थानीय भोटिया समुदाय के लोग आजकल लोसर पर्व की तैयारियों में जुटे हैं।
चार दिन तक चलने वाले समुदाय के त्योहार हिंदू धर्म के दीपावली, दशहरा और होली के रंगों को समेटे हुए है। इस बार समुदाय के त्योहार में रर्वाइं और जौनसार के कलाकारों के वाद्य यंत्रों की धूम आकर्षण का केंद्र रहेगा।
भारत तिब्बत की सीमा से लगे जाढूंग एवं नेलांग गांव से डुंडा में बसाए गए जाड-भोटिया समुदाय के लोग हर साल बौद्ध पंचांग के अनुसार नए साल के आगाज के साथ लोसर त्योहार मनाते हैं।
नववर्ष की पूर्व संध्या पर अमावस की रात को वे दीपावली के तौर पर मनाते हैं। इसमें दुख, रोग और अशांति को नष्ट करने के प्रतीक के तौर पर चीड़ के छिलकों की मशालें जलाई जाती हैं, जिसे गांव के तिराहे पर विसर्जित किया जाता है।
यहां काली दाल एवं चावल आदि सामग्री चढ़ाकर लोग एक-एक पत्थर अपने घर ले जाकर पूजा के स्थान पर रखते हैं। दूसरे दिन घर में डाली गई हरियाली काटकर एक दूसरे को शुभकामनाएं देने का दौर शुरू होता है।
दशहरा के तौर पर इस दिन देवता को चावल से बने देवभोग छंग का प्रसाद चढ़ाया जाता है। तीसरे दिन सुबह से दोपहर तक रंगो की बजाय आटे की होली खेली जाती है।
लोसर के अंतिम दिन लोग अपने घरों पर लगे पुराने झंडे उतारकर मंत्र लिखे नए झंडे चढ़ाते हैं। इस दौरान भोटिया समुदाय के लोग रनाड़ी गांव स्थित बौद्ध मठ तथा जाड समुदाय के लोग रिंगाली देवी के मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं।
इस बार समापन मौके पर त्योहार में रर्वाइं और जौनसार के कलाकार आकर्षण केंद्र रहेगा। प्रधान राजेश, पूर्व प्रधान नारायण सिंह नेगी, जसपाल सिंह, चरण सिंह, नारायण सिंह, चैन सिंह, जुलाल सिंह आदि ने बताया कि आठ फरवरी से शुरू होने वाला यह त्योहार 12 फरवरी तक चलेगा।