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खतरे की जद में चिन्हित तो किया लेकिन पुनर्वास करना भूली सरकार

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उत्तरकाशी। बाढ़ एवं भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील बस्तियों में रहने वाले परिवारों की धड़कने बढ़ने लगी हैं। प्रारंभिक सर्वे में जिले में 62 बस्तियों को संवेदनशील माना गया। अभी तक इनमें से सिर्फ नौ गांवों का ही डिटेल सर्वे कराकर 539 परिवारों को खतरे की जद में मानते हुए इनके विस्थापन की जरूरत बतायी गई, लेकिन एक परिवार का भी विस्थापन नहीं हो पाया।
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जनपद में वर्ष 1978 में गंगा भागीरथी की बाढ़, वर्ष 1991 में भूकंप, वर्ष 2003 में वरुणावत भूस्खलन व वर्ष 2012-13 में बाढ़ भारी तबाही मचा चुका है। इनके अलावा भी कमोबेश हर साल बादल फटने, गदेरों के उफान और भूस्खलन से जिले की दर्जनों आबाद बस्तियों पर खतरा मंडरा रहा है। बीते सालों में आपदाओं में आई तेजी को देखते हुए सरकार ने खतरे की जद में आयी बस्तियों का सर्वे कराया, तो जिले में 26 अत्यधिक संवेदनशील, 10 अति संवेदनशील और 26 संवेदनशील बस्तियां चिह्नित की गई।
डेढ़ साल पहले इनमें से भटवाड़ी, अस्तल, उडरी, धणेटी, सौड़ डुंडा, कमद, ठांडी, सिरी एवं धारकोट बनचौरा कुल नौ गांवों का जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के भूवैज्ञानिकों द्वारा डिटेल सर्वे कर 539 परिवारों को खतरे की जद में चिह्नित कर रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी गई। प्रशासन ने एक साल पहले इसमें से भटवाड़ी के 50 और अस्तल के 29 परिवारों के पुनर्वास की संस्तुति के साथ रिपोर्ट शासन को भेजी, लेकिन यह अभी तक शासन की फाइलों से बाहर नहीं निकल पायी है।
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भटवाड़ी के क्षेत्र पंचायत सदस्य राघवानंद नौटियाल का कहना है कि वर्ष 2010 में भूधंसाव से भटवाड़ी बाजार और गांव का बड़ा हिस्सा जमींदोज हो गया था। इन आठ सालों में सरकार ने तमाम सर्वे तो कराए, लेकिन प्रभावितों का पुनर्वास अभी तक नहीं किया। कई आपदा प्रभावित परिवार अब भी जल विद्युत निगम की कालोनी में तो कई खतरे की जद में आए घरों में रहने को मजबूर हैं।

कोट...
जनपद में भटवाड़ी और अस्तल के पुनर्वास की फाइल शासनस्तर पर लंबित है। विस्थापन के लिए स्थल चयन में ग्रामीणों की सहमति नहीं बन पा रही है। आपदा के लिहाज से संवेदनशील शेष बस्तियों के डिटेल सर्वे के लिए भी शासन को लिखा गया है। खतरे की जद वाली बस्तियों में रहने वाले परिवारों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया जाएगा।
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डा. आशीष चौहान, डीएम उत्तरकाशी।
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