उत्तरकाशी। देश हित में अपने खेत खलिहान एवं घर छोड़कर बंजारों सा जीवन गुजार रहे जाड समुदाय के लोग आज भी हक के लिए भटक रहे हैं। वर्ष 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध के करीब 56 साल गुजर जाने के बाद भी लोगों को सरकार की ओर से मुआवजा नहीं दिया गया है। इससे जनजातीय समुदाय ऊन उद्योग के सहारे किसी तरह अपना जीवन काट रहा है।
वर्ष 1960 में जब नवनिर्मित जनपद विकास के सपने देख रहा था, उसी वक्त जिले के सीमांत नेलांग जाढ़ूंग गांव में रहने वाले जाड समुदाय के लोग युद्ध के बादलों से घिर रहे थे। उस दौर में नेलांग एवं जाढ़ूंग गांव में करीब 70 परिवार रहते थे, जो करीब 1800 नाली भूमि पर खेती, पशुपालन एवं तिब्बत से व्यापार कर खुशहाल जीवनयापन कर रहे थे। युद्ध के बादल घिरने पर चीन सीमा पर समुद्र सतह से करीब 3,819 मीटर की ऊंचाई पर बसे इन आबाद गांवों को विस्थापित कर दिया गया। उस वक्त ग्रामीणों को उचित मुआवजा एवं बेहतर जीवन का भरोसा दिलाकर बगोरी, हर्षिल एवं डुंडा क्षेत्र में बसा दिया गया। वक्त गुजरने के साथ न तो मुआवजा मिला और न ही खुशहाल जीवन। इसके उलट इन गांवों को नेशनल पार्क में शामिल किए जाने से अब ग्रामीणों को अपने धार्मिक अनुष्ठानों और पशु चरान के लिए भी प्रशासन से मिन्नतें करनी पड़ती हैं। जाड समुदाय के नारायण सिंह नेगी बताते हैं कि विस्थापन के वक्त ग्रामीण खेतों में बोई हुई फसल तक नहीं काट पाए थे। अधिकारी और जनप्रतिनिधि वादे करके जाते रहे, लेकिन हमारा जीवन आज तक नहीं सुधरा। उन्होंने शासन-प्रशासन से मुआवजा दिलाने की मांग की है।
उस दौर में ग्रामीणों को डुंडा, हर्षिल, बगोरी क्षेत्र में जमीन दी गई थी। अब मुआवजे को लेकर शासन स्तर से ही कोई कार्रवाई हो सकती है। इस संबंध में आदेश मिलने पर कदम उठाया जाएगा।
देवेंद्र नेगी, एसडीएम भटवाड़ी।
नेलांग जाढ़ूंग के ग्रामीणों को मुआवजा दिलाने के लिए केंद्र से वार्ता की जा रही है। हाल ही में जिले के दौरे पर आए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को भी इस बारे में अवगत कराया गया है। जल्द ही इसके विस्तृत ब्यौरे के साथ गृह मंत्रालय स्तर पर पैरवी की जाएगी।
गोपाल रावत, विधायक गंगोत्री।