उत्तरकाशी। ‘यख बहुत समस्या छ साहब, हमारी कोई नि सुणदु’ यह दर्द है 88 वर्षीय इंद्रमणी भट्ट का जो अपने खुशहाल गांव को विराने में तब्दील होते देख रहे हैं। दिलसौड़ ग्राम पंचायत के चामकोट गांव को शासन-प्रशासन की अनदेखी ने मजबूरी के पलायन की तरफ धकेल दिया है। जिला मुख्यालय से महज छह किमी दूर 550 आबादी वाले गांव में आज करीब 100 लोग ही बचे हैं। गांव के अधिकतर परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते मातली, जोशियाड़ा, बाड़ाहाट जाकर किराये के मकानों में रहने को विवश हैं। ऐसे में गांव में मकान खंडहर होने लगे हैं।
दिलसौड़ व अठाली गांवों के मध्य बसे इस कृषि समृद्ध गांव में भी कभी बहुत रौनक थी। साल 2011 के कुछ महीने तो यहां पर छोटे वाहन भी चले, लेकिन 2013 की आपदा में गांव का मार्ग ढहने के बाद स्थितियां बदल गई। वर्तमान में गांव से 500 मीटर दूर स्थित दिलसौड़ व तीन किमी दूर अठाली गांव तक कच्चा मोटर मार्ग बना हुआ है, लेकिन शासन-प्रशासन ने बीच में फंसे गांव के लिए मार्ग बनाने की कोई जहमत नहीं उठाई। गांव के लिए 2010 में एक पुल भी स्वीकृत हुआ, लेकिन वो भी कागजों में ही सिमट कर रह गया। हालांकि प्रशासन ने खानापूर्ति करते हुए ग्रामीणों को आवागमन के लिए एक जर्जर ट्रॉली थमा दी है, जिसमें जान जोखिम में डालकर सफर करना एक चुनौती बनी हुई है। जिससे चार साल से गर्भवती महिलाओं, मरीजों, बुजुर्गों व स्कूली बच्चों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। गांव के रामसेवक चमोली का कहना है कि ग्रामीण घर छोड़कर जाना नहीं चाहते हैं, लेकिन सुविधाओं की कमी के चलते मजबूरन जाना पड़ रहा है। अगर जल्द सड़क या पुल नहीं बना तो गांव को पूरी तरह खाली होने में अधिक समय नहीं लगेगा।
चामकोट के लिए स्वीकृत पुल की डीपीआर तैयार कराई जा रही है। अगले पांच-छह माह में निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा। ग्रामीणों की समस्या को दूर करने के लिए सरकार की ओर से हर संभव सहायता प्रदान की जाएगी।
- गोपाल सिंह रावत, विधायक, गंगोत्री।
चामकोट के मार्ग को तकनीकी कारणों से बनाना संभव नहीं है। लेकिन गांव के लिए एक पुल स्वीकृत हो गया है। जल्द ही निर्माण कार्य भी शुरु हो जाएगा। - डा. आशीष कुमार श्रीवास्तव, जिलाधिकारी, उत्तरकाशी।