उत्तराखंड में बहुमत साबित करने के समय स्पीकर कौन होगा, सरकार के भविष्य का सारा दारोमदार इसी पर टिका है।
भाजपा व कांग्रेस के 09 बाकी विधायकों द्वारा स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल और डिप्टी स्पीकर अनुसुइया प्रसाद मैखुरी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने से यह स्थिति बनी है। विधानसभा संचालन नियमावली के अनुसार अगर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता है तो वह विश्वास मत हासिल होने तक पीठ पर नहीं बैठ सकते।
राज्यपाल इस स्थिति में एक प्रोटम स्पीकर तैनात कर सकते हैं या फिर यह व्यवस्था दी जा सकती है कि बहुमत के आधार पर सदन खुद प्रोटम स्पीकर चयनित कर लें। ऐसे में सरकार को सदन में खुद को बचाने से पहले पीठ की चुनौती से रूबरू होना होगा।
सीएम हरीश रावत के लिए अपनी सरकार बचाने के लिए 28 मार्च तक का समय है। 36 विधायकों का जादुई आंकड़ा हासिल करने के लिए जब वह सदन में उतरेंगे तो वह चाहेंगे कि पीठ पर सदन का संचालन प्रोटम स्पीकर करेंगे।
18 मार्च को विनियोग विधेयक पारित करने के दौरान सत्ता पक्ष के नौ विधायकों के सरकार के खिलाफ उतरने से समीकरण बदल गए। जब विधेयक पारित हो गया है तो व्हीप के उल्लंघन के दायरे में कांग्रेस विधायक नहीं आते हैं। ऐसे में बहुमत साबित करने के दौरान स्पीकर समेत 70 सदस्य मौजूद रहेंगे।
विधानसभा संचालन नियमावली
विधानसभा संचालन नियमावली के नियम 266 के मुताबिक अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास मत का संकल्प आने के 14 दिन बाद फ्लोर पर विश्वास मत हासिल होने के बाद पीठ पर आसीन हो सकते हैं। इस स्थिति में 35 विधायकों का अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती रहेगी।
प्रोटम स्पीकर की व्यवस्था
सबसे वरिष्ठ विधानसभा सदस्य को प्रोटम स्पीकर बनाया जाता है। कांग्रेस विधायक शैलेंद्र मोहन सिंघल जो सरकार गठन के समय वरिष्ठता के आधार पर प्रोटम स्पीकर बने थे अब भाजपा के खेमे के साथ हैं। सदन में सबसे वरिष्ठ सदस्य हरबंस कपूर हैं, जिन्हें प्रोटम की कमान मिलना भी रावत सरकार की धड़कने बढ़ाएगी।
टाई होने पर स्पीकर का वोट
प्रोटम स्पीकर मतदान में हिस्सा नहीं लेगा। अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष में मामला टाई होता है तो स्पीकर का वोट निर्णय करेगा। विधानसभा में 70 सदस्य हैं, जिसमें फिलहाल 36 भाजपा के साथ हैं जबकि बसपा का भी समर्थन उन्हें होने का दावा जताया जा रहा है।