केदारघाटी ही नहीं बल्कि पूरा पहाड़ बारिश के गहरे जख्मों से कराह रहा है। बस फर्क इतना है कि केदार घाटी में भगवान शिव महाकाल ने रौद्र रूप दिखा दिया जबकि बाकी क्षेत्रों में उनकी भृकुटी तनी दिखी।
रविवार को मैं भीगते-भागते किसी तरह दिल्ली से गांव तक पहुंच गया था। पिछले तीन दिन से लगातार बारिश हो रही थी। सोमवार को तो बारिश ने थमने की बजाय विकराल रूप ले लिया।
नींद खुली तो आसमान को काले व डरावने बादलों से घिरा पाया। फिर मूसलाधार बारिश। घर के आंगन से नीचे देखा तो नदी में लगातार जल स्तर बढ़ता जा रहा था। देखते-देखते नदी ने खतरनाक रूप ले लिया।
उत्तराखंड तबाही की संपूर्ण कवरेज देखने के लिए क्लिक करें
हमारे पुरखे कलीगाढ़ तल्ला गांव की नदी के बीचों बीच स्थित लाल रंग के विशाल पत्थर को जल स्तर मापने के लिए मानक के तौर पर उपयोग करते रहे हैं। इसे बाकायदा रताढूंगी (रात का पत्थर) नाम भी दिया गया।
यानी रताढूंगी कितनी डूबी इससे पता लगा लेते थे कि नदी तैर कर पार करने लायक है कि नहीं क्योंकि तब पुल नहीं होते थे। हालात इतने खराब थे कि आषाढ़ में ही रताढूंगी डूब गई।
देखें, उत्तराखंड तबाही की दुर्लभ तस्वीरें
शायद यह नजारा गांववासियों ने इससे पहले कभी नहीं देखा था। लैंसडौन तहसील के तहत गांव कलीगाड़ तल्ला की यह कली नदी आगे चल कर अपना अस्तित्व गंगा में विलीन कर जाती है।
विकराल नदी अपने किनारे के सब कुछ बहाती चली गई। कई बार लगा कि कहीं पूरा गांव भी भूस्खलन का शिकार न हो जाए।
खेत टूटते-बहते रहे। पडाड़ भी टूटते रहे। पुल क्षतिग्रस्त होते चले गये। बस चारों ओर पानी ही पानी था।
मोबाइल के सिग्नल नहीं मिल रहे थे। बिजली भी नदारद थी। रात डरते-डरते बीत गई कि कहीं बादल न फट जाए।
लेकिन मंगलवार को आखिरकार भगवान ने सुन ली। बारिश थम चुकी थी, लेकिन तब तक बहुत कुछ बदल चुका था।
पढ़ें, हजारों की संख्या में हैं मरने वाले
कलीगाढ़ तल्ला गांव, जहां दिल्ली से 10 और कोटद्वार से मात्र चार घंटे में पहुंचा जा सकता है, वहां की सभी लिंक रोड खत्म हो चुकीं थी। पुल भी क्षतिग्रस्त हो चुके थे।
पढ़ें, केदारनाथ के 100 पुरोहित मारे गए, 250 का पता नहीं
जब शुक्रवार को दिल्ली के लिए लौटना शुरू हुआ तो लगभग 8-10 किमी पैदल का सफर करना पड़ा। किसी तरह सड़क तक पहुंचे तो पता चला कि ज्यादातर बसें चार धाम के पीड़ित यात्रियों को लेने के लिए श्रीनगर भेज दी गई हैं।
इससे टैक्सी वालों की पौ बारह हो गईं। अभी भी सैंकड़ों गांव ऐसे हैं, जहां 8-10 किमी पैदल जाना होता है, वहां जीवन आज भी ठहरा जैसा है।