उत्तराखंड में आपदाएं आती रहीं हैं, लेकिन इस कदर अनाज के लिए त्राहिमाम की स्थिति यहां के लोगों को शायद पहले कभी नहीं देखनी पड़ी। पहले लोगों को विपत्ति के समय अनाज के भटकना नहीं पड़ता था और इसकी वजह थी पंचायती कोठार और कृषि की बारानाजा पद्धति।
उत्तराखंड आपदा की हर अपडेट के लिए क्लिक करें
इन व्यवस्थाओं के चलते विपत्ति के समय भी ग्रामीणों के पास भरपेट अनाज होता था। लेकिन साल दर साल पलायन के साथ ही यह परंपराएं भी दम तोड़ने लगीं और उसी का नतीजा आज हमारे सामने है। आज स्थिति यह है कि मुट्ठीभर अनाज के लिए भी लोगों को जान दांव पर लगानी पड़ रही है।
सिरोहबगड़ के समीप स्थित पपड़ासू पुल 16 जून को बाढ़ में बह गया। ऐसे में पुल की सहायता से सड़क मार्ग तक पहुंचने वाले कोटली, मलियासू, पपड़ासू, बांसी, मोलदा सहित कुल 18 गांवों के ग्रामीणों के समक्ष रसद का संकट आ गया। लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) यहां एक नया पुल बना रहा है जो अब तक पूरा नहीं हुआ है।
पढ़े, केदारघाटी में भारी दबाव में काम कर रहे पायलट
फिर भी रसद के लिए ग्रामीण जान जोखिम में डालकर यहां से गुजर रहे हैं। मलियासू गांव की 60 वर्षीय बुजुर्ग मखी देवी रसद के लिए निर्माणाधीन नए पुल से ही नदी पार करने लगी, लेकिन मंजिल तक पहुंचने से पहले ही पुल हिलने से अनियंत्रित होकर खाई में गिर गई। एक सप्ताह से उनका इलाज बेस अस्पताल में चल रहा है। ऐसा हाल कई लोगों का है जो राहत सामग्री लेने पहुंचे और अपनी जान गंवा चुके हैं। ऐसे में साफ है कि आज यदि पंचायती कोठार की व्यवस्था होती, तो इस तरह अनाज के लिए भूखों मरने की नौबत नहीं आती।
क्या है पंचायती कोठार की व्यवस्था
पंचायती कोठार की व्यवस्था के तहत गांव के प्रत्येक परिवार से अनाज की कटाई के समय अनाज का एक निश्चित हिस्सा पंचायत अलग रख देती थी। गांव के किसी व्यक्ति को कभी भी जरूरत पड़ती, तो इस कोठार से उसे अनाज दिया जाता।
इसके बदले में फसल कटने पर वह व्यक्ति पंचायती कोठार में ब्याज के रूप में दो-चार किग्रा अनाज अधिक देता था, ताकि कोठार के अनाज में वृद्धि होती रहे। वरिष्ठ संस्कृति कर्मी प्रो. डीआर पुरोहित कहते हैं कि पंचायती कोठार की व्यवस्था ने संवत् 1960 में 12 वर्ष तक पड़े अकाल के दौरान ग्रामीणों को भरपेट भोजन दिया था।
यह है बारानाजा पद्धति
बारानाजा पद्धति के तहत गेहूं, धान, चौलाई, मुंगरी, गहथ, तोर, कोंणी, झंगोरा, चींणा सहित कुल 12 प्रकार के अनाज बोए जाते थे। इनमें से कई ऐसी फसलें थीं जो वर्षा आधारित नहीं थीं, ताकि अकाल की स्थिति में भी कुछ न कुछ अनाज हो जाए और भोजन मिले।
गोविंद बल्लभ पंत पर्यावरण एवं विकास संस्थान के प्रभारी वैज्ञानिक डा. आरके मैखुरी और युवा वैज्ञानिक डा. विक्रम सिंह नेगी कहते हैं कि इस तरह की पारंपरिक वैज्ञानिक पद्धतियों से विपत्ति काल में भी उत्तराखंड के लोगों के पास भोजन के लिए कुछ न कुछ विकल्प अवश्य हुआ करता था।
खबर पर राय देने के लिए यहां क्लिक करें