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धर्म के आगे बाधा नहीं बनी मां की अर्थी

Wed, 24 Jul 2013 09:20 PM IST
हरिद्वार/कौशल सिखौला
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धर्म की जिम्मेदारी का निर्वहन करना आसान नहीं होता फिर चाहे इसके आगे अपनों की अर्थी ही क्यूं न आ जाए। यह बात शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज ने न केवल साबित की है बल्कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन भी धर्म के रास्ते पर ही पूरा किया।
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स्वामी राजराजेश्वराश्रम की जन्मदात्री मां श्रीमती वीरबाला शर्मा का कनखल के रामकृष्ण मिशन अस्पताल में मंगलवार रात निधन हो गया है। वे 80 वर्ष की थीं।

पौत्र ऋषि कुमार शर्मा ने दी दादी को मुखाग्नि
बुधवार दोपहर उनकी अंतिम यात्रा जगद्गुरु विद्यालय परिसर से कनखल श्मशान के लिए निकली। पौत्र ऋषि कुमार शर्मा ने दादी को मुखाग्नि प्रदान की। श्रीमती वीरबाला शर्मा चार-पांच दिनों से अस्वस्थ चल रही थी। मंगलवार शाम अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई।

आनन-फानन में उन्हें कनखल स्थित रामकृष्ण मिशन बंगाली अस्पताल में भर्ती कराया गया। रात के समय श्रीमती वीरबाला का हृदय गति रुकने से निधन हो गया। उनकी पार्थिव रात कनखल स्थित जगद्गुरु विद्यालय परिसर में लाई गई।
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बुधवार सवेरे उनके कई परिजन चंदौसी से हरिद्वार पहुंचे। नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट, विधायक मदन कौशिक, नगर मेयर मनोज गर्ग, भाजपा जिलाध्यक्ष कुलदीप गुप्ता, जिला महामंत्री राजीव शर्मा, विमल कुमार, डा. आलोक, जगद्गुरु परमार्थिक न्यास के महामंत्री रवींद्र भदौरिया सहित कई राजनेताओं, शिक्षाविदों एवं गणमान्य नागरिकों ने विद्यालय पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की।

मां वीरबाला की अंतिम यात्रा विद्यालय से शुरू हुई और कनखल श्मशान घाट पहुंची, वहां उनके पौत्र ऋषि कुमार ने मुखाग्नि दी। श्री मां के सभी कर्म कनखल में ही संपन्न होंगे।

जगद्गुरु ने निभाया संन्यास धर्म
आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य ने शंकर मठाम्नाय में संन्यासियों के लिए जिन नियमों का वर्णन किया है, उनका अक्षरश: निर्वहन शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज ने किया। अपनी जन्मदात्री मां को उन्होंने न तो कंधा दिया और न श्मशान तक गए।

यही नहीं उन्होंने जगद्गुरु आश्रम की प्राचीन धार्मिक परंपराओं का निवर्हन करते हुए जन्मदात्री मां की पार्थिव देह को आश्रम के बजाय विद्यालय भवन में स्थान दिया। संन्यास परंपरा के अनुसार कोई व्यक्ति स्वयं अपना श्राद्ध कर संन्यासी बनता है।

संन्यासी का नाता जन्म देने वाले माता-पिता और परिजनों से समाप्त हो जाता है और वह पूरे संसार की निधि बन जाता है। संन्यासी न कभी घर लौटता है और न शोक में आंसू बहाता है।

स्वामी राजराजेश्वराश्रम महाराज ने भी इसी धर्म का पालन किया। वह क्षण बेहद कष्ट भरा था जब पंडित ने उनके हाथ से तुलसी दल छुआ कर मृत माता के मुख में डाला। चूंकि संन्यास परंपरा में संन्यासी जन्मदाताओं से भी रिश्ते तोड़ लेते हैं।

आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित मूल्यों की रक्षा
अत: शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम महाराज ने सभी नियमों का पालन किया। जब जगद्गुरु विद्यालय से मां की अंतिम यात्रा निकल रही थी, तब भी वे आश्रम के बरामदे में शांत भाव से बैठे रहे।
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जगद्गुरु भले ही भीतर से भीग गए हों, किंतु संसार धर्म का पालन करते हुए उन्होंने आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित सभी मूल्यों की यथावत रक्षा की।
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