इस पार भी लोग जुटे हैं और उस पार भी। नीचे तूफानी वेग से बहती मंदाकिनी खौफ पैदा करती है। बीच में है सिर्फ बेबसी। एक छोर पर मौत तो दूसरे छोर पर जिंदगी है। तनी रस्सी के सहारे मौत की देहरी लांघने की कवायद है।
आटीबीपी के जवान दोनों छोरों पर रस्सी ताने खड़े हैं। एक बार में एक ही शख्स पार हो सकता है। लोगबाग एक्सपर्ट नहीं हैं। वैसे भी रस्सी पर चलना आसान नहीं है। जाहिर है पार निकल पाने की स्पीड बड़ी धीमी है। बहुतों का धैर्य चुकने लगता है। इस नदी पर रविवार को आईटीबीपी ने अस्थायी पुल बनाने की कोशिश की थी। सफलता नहीं मिली।
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लोगबाग बताते हैं कि राह खुलने की खबर से बदरीनाथ में फंसे लगभग दो हजार लोग पैदल ही जंगल-जंगल छानते अपनी जान बचाने चल दिए। लेकिन मंजिल तक नहीं पहुंच पाए। जंगल में ही फंसे हुए हैं। आपदा मंत्री यशपाल आर्य से इन्हें निकालने की बात हुई थी। आश्वासन दिया था, लेकिन पूरे दिन सिर्फ बदरीनाथ मंदिर के आसपास फंसे यात्री ही निकाले जाते रहे। बीच रास्ते में फंसे यात्रियों पर किसी का ध्यान नहीं गया। बारिश, मौसम, भूख, प्यास और बीमारी से लस्त-पस्त मैदानी लोगों के लिए पहाड़ के कठिन रास्ते बेहद चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। जिंदगी के आगे अंधेरा ही अंधेरा है।
शासन-प्रशासन का कोई नुमाइंदा नहीं पहुंचा
उधर, तबाही में बर्बाद हुए लामबगड़ के आसपास के आधा दर्जन गांव के लोग अपने घर खाली करके ऊपर जंगलों में चले गए हैं। मंदाकिनी की लहरों ने काट-काटकर इनके घरों की नींव खोखली कर दी है। भूख-प्यास, खाने-पीने के सामानों की कमी इनकी भी जिंदगी को दुश्वार बना रही है। सरकार, शासन-प्रशासन का कोई नुमाइंदा यहां तक नहीं पहुंचा।
कभी सबको रोशनी बांटने वाला जेपी पावर हाउस अंधेरे में है। गाद और मलबे ने जेपी हाइड्रोप्रोजेक्ट की टरबाइनों को ठप कर रखा है। जिन राहों पर चल कर हम गुजर रहे हैं उन्हें सड़क कहना बेमानी है। राह आसान नहीं है। साथी फोटोग्राफर अभ्युदय के पांव में भयानक दर्द है।
सुबह होगी फिर लोगों का हाल देखेंगे। फिलहाल जो दुखा वह न सिर्फ दुखद और त्रासद है। आटीबीपी के जवानों को छोड़ दें तो आपदा के बाद शासन-प्रशासन की ओर मौजूदगी यहां नहीं दिखती। बदइंतजामी का आरोप कौन लगाए यहां तो कोई इंतजाम ही नहीं दिखता।