आने वाले समय में उत्तराखंड में पंच परमेश्वर फिर दिख सकते हैं। विधानसभा से पारित नए पंचायत अधिनियम में कांग्रेस जाते-जाते इसकी व्यवस्था भी कर गई है। पंचायत एक्ट को राजभवन से भी मंजूरी मिल चुकी है और अब मामला शासन और आने वाली सरकार के पाले में होगा।
प्रदेश के नए पंचायत एक्ट में यह साफ कर दिया गया है कि न्याय पंचायतों को गांवों की कोर्ट के रूप में विकसित करने के लिए विधानसभा कानून भी बना सकेगी।
प्रदेश में 80 के दशक तक न्याय पंचायतों की व्यवस्था थी। पर्वतीय क्षेत्रों में एक पट्टी में बाकायदा एक सरपंच होता था और ग्राम पंचायत सदस्यों में से ही पंचों का चुनाव होता था। गांवों की इस व्यवस्था में फौजदारी तक के मुकदमों की सुनवाई होती थी।
यूपी का पंचायत एक्ट ही स्वीकार कर लिया
80 के दशक के बाद यह व्यवस्था खत्म होती चली गई। उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो उत्तर प्रदेश का पंचायत एक्ट ही जस का तस स्वीकार कर लिया गया। 17 मार्च को विधानसभा में नया पंचायती राज विधेयक पारित होने के बाद राजभवन से इसे मंजूरी दे दी है।
नए अधिनियम में न्याय पंचायतों के गठन का प्रावधान भी कर दिया गया है। न्याय पंचायतों के गठन के लिए सरकार को न्याय पंचायत के सदस्यों की संख्या, निर्वाचन, कार्यकाल आदि का निर्धारण करने का अधिकार दिया गया है। विधानसभा को यह भी अधिकार दिया गया है कि न्याय पंचायतों को ग्राम न्यायालयों के रूप में विकसित करने के लिए वह कायदे कानून भी तय करे।
पंचायतों से लंबे समय से जुड़े जोत सिंह बिष्ट के मुताबिक 1982 तक उत्तराखंड में यह व्यवस्था थी। इसके तहत पट्टी में कम से कम एक न्याय पंचायत हुआ करती थी और गांवों के कई मामले इन न्याय पंचायतों में ही सुलझ जाते थे।
न्याय पंचायत में सरपंच के सहयोग के लिए एक अधिकारी भी होता था, जिसे पंचायत मंत्री कहा जाता था। प्रदेश में दूर-दराज के गांवों के लिए यह व्यवस्था बेहद कारगर मानी जाती थी।