अमर उजाला के अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स कार्यक्रम के तहत आयोजित संवाद कार्यक्रम में नारी के अस्तित्व और सशक्तीकरण को लेकर सार्थक चर्चा की गई। नारी को नारायणी बताते हुए कहा गया कि समाज में बहू और बेटी के बीच का अंतर खत्म कर नारियों को अपने निर्णय खुद लेने की क्षमता विकसित करनी होगी।
बृहस्पतिवार को रामनगर रोड स्थित राजमहल बैंक्वेट हॉल में हुए अपराजिता के संवाद कार्यक्रम में सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के बीच विचारों का आदान प्रदान हुआ। इसमें लिंग भेद की विषमताओं को समाप्त करके महिलाओं को बराबरी के अधिकार और समान अवसर प्रदान करने पर फोकस रहा।
कहा गया कि उत्तराखंड राज्य व चिपकों जैसे बड़े आंदोलनों की अगुवाई महिलाओं ने की। इन आंदोलनों के सुखद परिणामों का श्रेय मातृशक्ति को जाता है। कहा कि अधिकार प्राप्ति के लिए महिलाएं अपनी मर्यादाओं की सीमा न लांघे। अधिकारों के अतिक्रमण से परिवारों में विघटन की स्थिति उत्पन्न होती है।
अमर उजाला का यह अनूठा प्रयास है। विभिन्न क्षेत्रों में प्रताड़ित की जानी वाली महिलाओं को इस कार्यक्रम में सहभागी बनाना होगा। ताकि उनके अनुभवों को साझा कर उन्हें अधिकार दिलाने की दिशा में काम किया जा सके। वह खुद भी पुरुष सत्तामक सोच की शिकार हुई है। इसी अन्याय ने उन्हें संघर्ष करने का संबल प्रदान किया है।
- सरोज ठाकुर, अध्यक्षा महिला एवं बाल सहायता समिति
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हमारे समाज में जहां एक और देवियां पूजा जाती है, वहीं बेटियों का भी शोषण किया जाता है। लिंग भेद का अंतर समाप्त करने के लिए बेटा-बेटी को संस्कारित करना चाहिए। महिलाओं को राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में प्रयास करने चाहिए। महिलाओं को सही ढंग से दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
- अलका पाल, तीलू रौतेली पुुरस्कार से सम्मानित
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अच्छे घरों की लड़कियां दबे, ढके रहती हैं, अच्छी और बुरी बात पर प्रतिवाद नहीं करती, यह सीख देने वाली भी अक्सर महिला ही होती हैं। सर्वप्रथम महिलाओं को महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव दिखाना होगा। महिलाओं को अपने अधिकार तो पता है लेकिन उनमें अधिकार पाने की इच्छा शक्ति कम है। महिलाओं को ही सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष का अलख जगाना होगा।
- ललिता कार्की, पूर्व शिक्षिका एवं फैशन डिजाइनर
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नारी को देवी का स्वरूप माना जाता है। देवी के आठ रूपों को अपने जीवन में साकार करना चाहिए। ताकि एक सुसंस्कृत समाज स्थापित हो सके। देवी का दुर्गा रूप विषम परिस्थितियों में अपनाया जा सकता है। अधिकांश महिलाएं कुंठा का शिकार है। महिलाओं से सुझाव तो लिए जाते हैं, लेकिन निर्णयों में उनकी भूमिका नहीं होती।
- नमिता पंत, शिक्षिका एवं योग प्रशिक्षक
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अपनी प्रतिभा उजागर करने के लिए महिलाओं को पुरूष सत्ता द्वारा तय लक्ष्मण रेखा को लांघना होगा। महिलाओं को अपराजिता बनाने में अभिभावकों की भूमिका बहुत जरूरी है। बेटियां अपनी रुचि के मुताबिक आगे बढ़ेगी तो वह देश के विकास में अधिक क्षमता से योगदान कर सकेंगी। विवाहित बेटी पर दो घरों की जिम्मेदारी होती है।
- रक्षिता नागर, समाजसेवी एवं लेखिका
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घर को जन्नत बनाने में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। अमर उजाला के अपराजिता कार्यक्रम के तहत गांव की चौपालों पर संवाद आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को उनके अधिकारों व स्वावलंबन के लिए प्रेरणा मिल सके। अमर उजाला का अपराजिता कार्यक्रम इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
- अंजुम अख्तर, छात्रा
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परिवारों के विघटन में संचार माध्यमों की भूमिका खतरनाक साबित हो रही है। मामूली पारिवारिक विवादों की सूचना तत्काल महिला के मायके वालों तक पहुंच जाती है। उनके दखल से विवाद बढ़ता है। महिलाओं को धैर्य व संयम का परिचय देना चाहिए। अगर वास्तव में कहीं प्रताड़ित किया जा रहा है, तो फिर समझौते की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।
- कामिनी श्रीवास्तव, अधिवक्ता।
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परिवार में सामंजस्य बनाने के लिए महिलाएं ज्यादा आत्म संयत रहती है। उनमें सहनशीलता पुरुषों की तुलना में अधिक होती है। परिवार में ऐसा वातावरण हो कि बेटी अगर बर्तन मांझती है, तो बेटे को भी घर के काम में हाथ बंटाना चाहिए।
- जया पंत, सामाजिक कार्यकर्ता।
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महिलाओं को कानून में दिए गए अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाना जरूरी है। महिला हेल्प लाइन का गठन भी एक सराहनीय प्रयास है। इसमें होने वाली कांउसलिंग से परिवार को बचाने में मदद मिल रही है।
- हेमा जोशी, अधिवक्ता।
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एक अच्छे समाज के लिए महिलाओं के लिए शिक्षित होना जरूरी है। बेटी पराया धन है, यह सोचकर बेटी और बेटे में भेदभाव नही करना चाहिए। बेटी को भी बेटे के बराबर सम्मान व अधिकार मिले। इसमें मां की भूमिका अहम होती है। जो बालपन से ही बच्चों में समान व्यवहार के संस्कार विकसित करें।
- डॉ. प्रतिमा गुप्ता, महिला काउंसलर
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महिलाओं के सरंक्षण के लिए सरकार ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा दिया है। इसमें बेटी बढ़ाओ और जोड़े जाने की आवश्यकता है। ऊंचाईयां छूने के लिए कामयाब महिलाओं के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने प्रयास सार्थक करने होंगे।
फिरोजा, छात्रा