खटीमा। उपखंड के वन क्षेत्र किलपुरा, सुरई एवं खटीमा वन रैंजों में अब टाइगर भी दहाड़ेंगे, जबकि खटीमा एवं किलपुरा वन रैंजों में गजराज की चिंघाड़ पहले से सुनी जाती रही है। तीनों रेंजें टाइगर एवं लैपर्ड के लिए सिरमौर बनने लगी हैं। यह जानकारी डब्ल्यू डब्ल्यू एफ के सदस्यों ने एक माह तक जंगल की आंतरिक हलचल को सीसी कैमरों में कैद करने के बाद दी।
पीलीभीत रोड स्थित वन विश्राम गृह में पत्रकारों के रूबरू हुए उप प्रभागीय वनाधिकारी राजेश श्रीवास्तव एवं डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सीनियर प्रोजेक्ट आफीसर शाह मोहम्मद विलाल एवं वरिष्ठ परियोजनाधिकारी शिराज अनवर ने बताया कि उनकी एक माह की मेहनत रंग लाई। उन्होंने बताया कि 2004 में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की रिपोर्ट में इन जंगलों को टाइगर विहीन बताया था वहीं एक माह के अध्ययन से एहसास हो रहा है कि यहां लैपर्ड के साथ ही टाइगर ने उपस्थिति दर्ज की है। टीम ने बताया कि खटीमा रैंज के नखाताल क्षेत्र में दो, तीन टाइगर होने के संकेत हैं। किलपुरा रैंज में इसकी संख्या पांच, छह संभावित हैं, जबकि गजराज बाहूल्य क्षेत्र किलपुरा में भी तीन एवं चार टाइगर होने के प्रमाण हैं। टीम ने बताया कि इन रैंजों में टाइगर एवं लैपर्ड के भोजन की पर्याप्त व्यवस्था है। रिजर्व फारेस्ट की तीनों रैंजों में दुर्लभ प्रजातियों के वन्य जंतुओं की मौजूदगी के साथ ही वनराज टाइगर की उपलब्धता वन विभाग के लिए शुभ संकेत हैं।
रिजर्व फारेस्ट में प्रत्येक संभावित स्थानों पर 30 जोड़े सीसी कैमरे लगाए गए थे, जिनमें जंगल के अंदर दिन-रात होने वाली गतिविधियां कैद हैं। इनका अध्ययन विभाग के एक्सपर्ट करेंगे। फिलहाल गतिविधियों में टाइगर की उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी जा रही है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ टीम की मानें तो प्रदेश के तराई के जंगल वन्य प्राणियों के सिरमौर बनने लगे हैं। इस अवसर पर वन क्षेत्राधिकारी यूडी कांडपाल, टीएस शाही, केसी कफल्टिया आदि थे।