चीन से लगती सीमा पर भारत के अंतिम गांव माणा में भोटिया जनजाति के ग्रामीण कुदरती आपदा के साथ दूसरे किस्म की भी अग्निपरीक्षा से गुजर रहे हैं। बदरीधाम की यात्रा पर ही इनकी रोजी-रोटी निर्भर है। माणा गांव बदरीधाम के हक-हकूकधारी हैं।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
हक-हकूकधारी धामों के आसपास के वे ग्रामीण हैं जिन्हें आदि शंकराचार्य ने ही धाम में पूजा-पाठ में सहयोग का अधिकार दिया है। माणा के ग्रामीणों को बदरीविशाल के लिए घृतकंबल तैयार करने का हक मिला है। शीतकालीन शयन के दौरान भगवान बदरीनाथ घी से डुबोया हुआ कंबल ओढ़ते हैं जिसे इसी गांव के लोग तैयार करते हैं।
दीए जलाने की जिम्मेदारी होती है
मंदिर समिति की ओर से इन्हें कुछ नहीं मिलता, अलबत्ता तीर्थयात्री अपनी ओर से इन्हें कुछ दे देते हैं। माणा के लोगों पर सावन में बदरीनाथ धाम में दीए जलाने की जिम्मेदारी होती है। आपदा में फंसे यात्रियों के लिए इस बार ग्रामीणों ने अपनी चिंता किए बगैर 20 जून से तीर्थयात्रियों के लिए नि:शुल्क भंडारे का आयोजन किया, जिससे उनके यहां राशन समाप्त हो गया।
अब ये लोग दाने-दाने के मोहताज हैं। माणा गांव में भोटिया जनजाति के 300 परिवार हैं। बृहस्पतिवार की सुबह माणा गांव के ग्रामीण बदरीनाथ में प्रशासन के अधिकारियों को मिलने आए, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं हुआ। ग्रामीणों का कहना है कि 12 दिन गुजर जाने पर भी प्रशासन ने उनकी कोई खैर-खबर नहीं ली है।
माणा में सेना का कार्यालय भी मौजूद है। माणा गांव के ग्रामीण ऊनी वस्त्रों का निर्माण के साथ ही आलू, राजमा, फरण का उत्पादन कर अपनी आजीविका चलाते हैं। आपदा ने फसलें तबाह कर डाली हैं।
बदरीनाथ यात्रा बंद हो चुकी है
गांव की प्रधान गायत्री मोल्फा, पूर्व प्रधान पीतांबर मोल्फा का कहना है कि बदरीनाथ धाम पहुंचने वाले तीर्थयात्री माणा गांव जरूर पहुंचते हैं। ऊनी वस्त्र भी खरीदते हैं। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि बदरीनाथ यात्रा बंद हो चुकी है।
गांव भी नदी साइड से धंस रहा है। हम कहां जाएं, क्या करें, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। जिला प्रशासन ने ग्रामीणों को राहत सामग्री बांटने तक की जहमत नहीं उठाई है।