एक मोबाइल कंपनी का सलोगन 'एन आइडिया कैन चेंज योअर लाइफ' उत्तराखंड की सियासी उठापटक के बाद आए नतीजे पर सटीक बैठता है।
बस इसे थोड़ा बदलकर यूं भी कह सकते है कि 'ए स्टिंग कैन स्पॉयल योअर कॅरियर'। परिणाम सामने है कि इस कथित स्टिंग सामने आने के बाद ही हरीश जीती हुई जंग हार गए। कांग्रेस के नौ बागी विधायकों की सदस्यता रद्द कर सदन में बहुमत प्राप्त करने की रणनीति बहुमत साबित करने के करीब थी, लेकिन स्टिंग से हरीश रावत बैकफुट पर चले गए।
बजट सत्र शुरू हुआ तो हरीश रावत शुरू से ही विपक्ष पर हावी थे। 14 मार्च को भाजपा ने विधानसभा का घेराव में शक्तिमान नाम के घोड़े की टांग टूटी तो देश भर में ऐसा वीडियो वायरल हुआ कि भाजपा खुद ही राजनीतिक रूप से लंगड़ी हो गई। 18 मार्च को सदन में कांग्रेस के नौ विधायक बागी हुए तो जनभावनाएं स्पष्ट रूप से हरीश रावत के पक्ष में महसूस हो रही थी।
25 मार्च तक हरीश रावत पूरी तरह से भाजपा को हाशिए पर धकेले रहे। राज्य के जनमानस में कहीं ना कहीं यह बात थी कि भाजपा और कांग्रेस के बागी हरीश रावत को बेवजह परेशान कर रहे है।
इसकी सहानुभूति भी लगातार स्पष्ट रूप से मुख्यमंत्री हरीश रावत को मिल रही थी, लेकिन 26 मार्च को जैसे ही हरीश रावत का कथित स्टिंग मीडिया में आया तो उसने सारी बाजी पलट दी और हरीश जीती हुई जंग हार गए। दरअसल, हरीश रावत इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में फेल साबित हुए। उन्होंने ने अपने राजनीतिक तजुर्बे को इस पूरे एपिसोड में हाशिए पर रखा।
सरकार बचाने के लिए मध्यस्थता करने आए व्यक्ति पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना ही राज्य के राजनीतिक बहाव को खतरे के निशान से ऊपर ले गए। बाकी सब ठीक था, लेकिन केवल एक स्टिंग ने हरीश के शतरंज के प्यादो को ऐसी मात दी कि सारी बिसात छिन्न भिन्न हो गई।
राजनीति में भयावह है स्टिंग का इतिहास
देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था का इतिहास गवाह है कि आज तक सीडी कांड में जितने भी राजनेता फंसे उनकी राजनीति वनवास ही नहीं अज्ञातवास जैसी हो गई। वह कभी मुख्य धारा में नहीं लौटे। अब देखना यही है कि 25 साल तक लगातार हार के बाद भी हरिद्वार से जीतकर केंद्रीय मंत्री और फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हरीश रावत पर क्या गुजरती है?
राजनीति के जानकार लोग अभी बंगारू लक्ष्मण का नाम भूले नहीं होंगे। वह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे। उनका स्टिंग हुआ, देश भर में ऐसी फजीहत हुई कि सियासत की मुख्यधारा में उनकी वापसी नहीं हो सकी। छत्तीसगढ़ के राजा दिलीप सिंह जूदेव, जिनका अच्छा खासा जनाधार था।
सांसद से केंद्रीय मंत्री तक बने, लेकिन एक स्टिंग ने उनकी सियासत भी खत्म कर दी। वह अपने क्षेत्र में लोकप्रिय थे, मास लीडर भी थे, लेकिन भाजपा ने उनका बहुत इस्तेमाल नहीं किया। दो साल पहले उनका निधन हो चुका है।
हिमाचल के हमीरपुर से सांसद रहे सुरेश चंदेल मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, प्रेमकुमार धूमल को उन्हीं से खतरा था, लेकिन एक स्टिंग हुआ और उनका पूरा राजनीतिक करियर चौपट हो गया। अब चंदेल कहां है किसी को खबर नहीं है। हरीश रावत भी उसी दौर से गुजर रहे है।
कथित स्टिंग के वायरल होने के बाद ही हरीश सरकार को जाना पड़ा। अब हरीश रावत क्या करेंगे और लोकतंत्र के इतिहास की ये घटनाएं उन पर लागू होगी या फिर वह जूझकर मुख्य धारा में आएंगे, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल उनके लिए कठिन घड़ी पैदा हो गई।