उत्तराखंड के सरकारी अस्पतालों में एक बार फिर दवाओं का संकट गहरा गया है। ज्यादातर अस्पतालों में मरीजों को वैकल्पिक दवाएं दी जा रही हैं या उन्हें बिना दवाओं के बिना लौटाया जा रहा है। कुछ चिकित्सक बाजार की दवाएं भी लिख रहे हैं। हालांकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी दवाओं की कमी की बात मानने को तैयार नहीं है।
दरअसल, दवाओं की खरीद ना होने के कारण अस्पतालों में मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। महानिदेशालय स्तर से भी सभी दवाओं की खरीद नहीं हो पाई है। वहीं एंटी रैबीज समेत कई दवाओं की आपूर्ति नहीं हो पाई है। इसके चलते मरीज बाजार से महंगे दामों पर दवा खरीदने को मजबूर हैं। विभाग की ओर से दवाओं की कमी के संबंध में जानकारी देने पर रोक लगाई गई है। विभागीय अधिकारी भी दवा संकट की बात मानने को तैयार नहीं हैं, लेकिन बाजार से दवा खरीद रहे और अस्पताल की फार्मेसी से बैरंग लौट रहे मरीजों को देखकर विभाग के दावों की पोल खुल रही है।
पहाड़ के दूरस्थ और दुर्गम ही नहीं मैदानी क्षेत्रों के अस्पतालों में भी दवाओं का संकट बना हुआ है। राजधानी का सबसे बड़ा दून अस्पताल भी इससे अछूता नहीं है। चिकित्सक मरीजों को वैकल्पिक या बाजार की दवाएं लिख रहे हैं। अन्य सरकारी अस्पतालों में भी इसी तरह की स्थिति बनी हुई है। महानिदेशालय स्तर से दवाओं की आपूर्ति का दावा किया जा रहा है, लेकिन वहां से केवल केंद्र के स्तर से स्वीकृत 103 ही दवाएं मिल रही हैं।
सीएमओ स्तर पर टेंडर ही नहीं
नीति में 70 फीसदी दवाओं की खरीद महानिदेशालय और 30 फीसदी सीएमओ कार्यालय के स्तर से करने का प्रावधान है। लेकिन, सीएमओ स्तर से अभी तक टेंडर हीं नहीं हो पाए हैं। ई टेंडरिंग की जटिलताओं के चलते सीएमओ अभी तक टेंडर नहीं करवा पाए हैं। इसके चलते फिलहाल दवाओं की खरीद मुश्किल लग रही है।
बिना बदलाव खरीद मुश्किल
दवाओं की खरीद ना हो पाने के पीछे नई औषधि क्रय नीति के जटिल प्रावधानों को सबसे प्रमुख कारण माना जा रहा है। प्रदेश की फर्म के 20 करोड़ व बाहरी फर्म के 70 करोड़ टर्नओवर और 23 फीसदी कम कीमत पर दवा उपलब्ध कराने जैसी शर्तों के चलते कोई भी टेंडर में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री से लेकर सचिव स्वास्थ्य तक को मानना पड़ा है कि नीति में बदलाव की जरूरत है। इसको लेकर कवायद भी शुरू हो गई है। इसमें फर्म के टर्न ओवर की लिमिट और दवाओं की कीमत में बदलाव का मामला प्रमुख है।
सीएमओ स्तर से दवा खरीद की प्रक्रिया में तेजी लाई जा रही है। अस्पतालों को डिमांड के मुताबिक दवाएं भेजी जा रही है। फिलहाल दवा संकट जैसी कोई बात नहीं है।
- डा. कुसुम नरियाल, स्वास्थ्य महानिदेशक