भगवान शिव के भीतर भड़क रही विष ज्वाला को शांत करने के लिए देवताओं ने कांवड़ में जल लाकर उन पर जलधारा डाली थी। इससे भगवान शिव को शीतलता मिली थी। तभी से भगवान शिव को जलधारा प्रिय है।
श्रावण मास में कांवड़ में घड़े बांधकर गंगाजल लाकर भगवान शिव धारा बनाकर चढ़ाने भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। जो श्रद्धालु सच्चे मन से इस कार्य को करता है। भगवान शिव उसकी सभी इच्छाएं पूरी करते हैं और उसे मनोवांछित फल देते हैं।
जब कंठ में धारण किया विष्ा
ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश शुक्ला ने बताया कि देवताओं और दैत्यों द्वारा जिस समय समुद्र मंथन कर अमृत निकाला था। उस दौरान अमृत के साथ विष भी निकला था। जिसे देख सभी देवता और दैत्य भयभीत हो गये थे। तब भगवान शिव ने इस विश को पीकर कंठस्थ किया था।
तभी से भगवान शिव को नीलकंड नाम भी पुकारा जाता है। विष को पीते ही भगवान शिव में विष ज्वाला भड़क गई। जिससे वह व्याकुल होने लगे। विष ज्वाला को शांत करने के लिए देवतागण पवित्र नदियों का जल कांवड़ के द्वारा लाए और उसकी जलधारा बनाकर शिव को अर्पित किया।
इससे भगवान शिव को शीतलता मिली। जिससे भगवान शिव बेहद प्रसन्न हुए। पंडित शुक्ला ने बताया कि तभी से भगवान शिव को जल धारा बेहद प्रिय है। जो भक्त भगवान शिव सच्चे मन से जलधारा अर्पित करता है।
उस भक्त पर शिव प्रसन्न होते हैं। जिसके कारण उस भक्त के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। तभी से कांवड़ में जल लाकर भगवान शिव पर अर्पित किया जाता है।
16 से शुरू हो जाएगी कांवड़
16 जुलाई से कांवड़ उठनी शुरू हो जाएगी। दूर दराज से आने वाले कांवड़ियों इस दिन कांवड़ उठानी शुरू कर देंगे। 16 जुलाई को श्रावण संक्राती है। 23 से श्रावण शुरू हो रहा है।
पंडित राकेश शुक्ला ने बताया कि 4 अगस्त को शिवरात्री है। इस कांवड़ से लाया गया गंगाजल जलधारा बनाकर कांवड़िये भगवान शिव को अर्पित करेंगें।