भारतवर्ष में पीठों का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। आदिशंकराचार्य ने यद्यपि चार पीठ स्थापित किए थे, किंतु कालांतर में काशी और अन्यत्र के विद्वान पंडितों की विद्वत् परिषदों ने 20 से अधिक पीठ देशभर में स्थापित कर दी।
इस समय देश में शंकराचार्यों की संख्या करीब 22 है। इसी भांति रामानंदाचार्य भी दर्जन भर हो गए हैं। अकेले हरिद्वार में ही तीन जगद्गुरू रामानंदाचार्य निवास करते हैं।
शंकराचार्य पीठों की स्थापना के लिए वस्तुत: विद्वत् परिषद जिम्मेदार है। आदिशंकराचार्य ने काशी विद्वत् परिषद को अधिकृत किया था कि वह उपयोगिता को देखकर विद्वान संतों को चार पीठों के शंकराचार्य पदों पर आसीन करे। शंकर महामठाम्नाय के अंतर्गत जगद्गुरू आदिशंकराचार्य ने पूरी व्यवस्था भी दी है जिसे चारों पीठों पर मान्यता प्राप्त है।
इसके बावजूद विद्वत् परिषद विभाजित होती गई तथा नई विद्वत् परिषद भी बनती गई। इन परिषदों ने चार शंकराचार्यों की संख्या को बढ़ाकर करीब 22 कर दिया। इस विवाद को निपटाने के लिए सामूहिक रूप से चूंकि संत जगत आगे नहीं आता, अत: विवाद यथावत बना हुआ है।
यही हाल बैरागियों के धर्मगुरू जगद्गुरू रामानंदाचार्यों का है। आदि रामानंदाचार्य ने काशी में जगद्गुरू पीठ की स्थापना की थी। अब आलम यह है कि देश में बारह से अधिक रामानंदचार्य पदासीन हैं। अकेले हरिद्वार तीर्थ की ही बात की जाए, जगद्गुरू रामानंदाचार्य के रूप में घनश्याम भवन के अधिष्ठाता रामाधार दास महाराज, जगन्नाथ धाम के अधिष्ठाता हंसदेवाचार्य महाराज तथा नृसिंह धाम के अधिष्ठाता अयोध्या दास को जगद्गुरू रामानंदाचार्य का दर्ज प्राप्त है।
यह गौरतलब यह है कि हरिद्वार की आचार्य पीठ पर रहने वाले रामनरेशाचार्य काशी की मूल पीठ के जगद्गुरू रामानंदाचार्य पद पर आसीन हैं। अपने ही गृहनगर में तीन अन्य जगद्गुरू रामानंदाचार्य बनते हुए देखने के अलावा उनके पास और कोई रास्ता नहीं है।
जगद्गुरूओं ने देश की आध्यात्मिक शांति एवं आध्यात्मिक क्रांति के लिए शंकराचार्य तथा रामानंदाचार्य की जो व्यवस्था की थी, वह कलयुग के इस चरण में पूरी तरह बिखर गई है। धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु की बात छोड़िए, स्वयं चार पीठों के प्रमुख शंकराचार्य भी इस विवाद का निराकरण कराने में असमर्थ हैं। यही वजह है कि कोई बड़ा धार्मिक मुद्दा आने पर एक राय कभी भी नहीं आती।
पार्वत्याचार्य पर भी नहीं निपटा विवाद
हरिद्वार कुम्भ से पूर्व मां योग शक्ति ने हरिद्वार में जगद्गुरू पार्वत्याचार्य की महिला पीठ स्थापित कर महिला संत स्वामी ज्योतिषानंद को पहला जगद्गुरू पार्वत्याचार्य घोषित किया था। इस समय अखाड़ों के संतों ने पुरुष संतों के क्षेत्र में हस्तक्षेप का सवाल उठाकर दोनों महिला संतों को हरिद्वार से जबरन खदेड़ दिया था।
दु:ख का विषय है कि महिला क्रांति के इस दौर में इन दोनों महिला संतों को देश छोड़कर अमेरिका जाना पड़ा और वहीं अपना संसार बसाना पड़ा। कोई भी शंकराचार्य अथवा रामानंदाचार्य महिला संतों के इस अधिकार को मान्यता देने के लिए आगे नहीं आया।