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जुनून और जिद के पक्के कॉटले को था जीवाश्म एकत्र करने का शौक

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सर थॉमस कॉटले जहां एक ओर अपने काम के प्रति जुनून और जिद रखते थे वहीं दूसरी ओर उन्हें रोमांचक कार्यों में आनंद मिलता था। गंगनहर बनाने में इंजीनियरिंग के नायाब तरीकों का इस्तेमाल करने वाले कॉटले जीवाश्म प्रेमी भी थे। उन्होंने पहाड़ियों में कई दुर्लभ जीवाश्म की अपने एक मित्र के साथ खोज की। इनमें हाथी, शुतुरमुर्ग, विशालकाय सारस जैसे पशु पक्षियों के अवशेष शामिल हैं। इनके संग्रह के लिए उन्हें लंदन में सम्मान भी दिया गया था।
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भारत के लिए थॉमस कॉटले की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। गंगनहर का निर्माण कर जहां उन्होंने विश्व की सबसे बेहतरीन इंजीनियरिंग का प्रयोग किया। वहीं, इस गंगनहर से लाखों हेक्टेअर कृषि भूमि को पानी मिला। इससे लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। कॉटले ने जिस तरह मानवता के हित में काम किया उस लिहाज से उनके जीवन के बारे में जानना भी बेहद जरूरी है। 1802 में इंग्लैंड के सफोक काउंटी के स्टार्ट फोर्ड सेंटमेरी गांव में जन्मे कॉटले का कार्यक्षेत्र मूलरूप से इंजीनियरिंग का नहीं था। बावजूद इसके उन्होंने सोलानी एक्वाडक्ट का निर्माण कर सिविल इंजीनियरिंग का बेशकीमती नमूना पेश किया। पुराने दस्तावेजों में कई जगह उल्लेख है कि कॉटले अपने धुन और जिद के पक्के थे। जो भी मन में ठान लेते थे, उसे पूरा करने के बाद ही दम लेते। गंगनहर निर्माण के दौरान काम में लगे हजारों श्रमिक भी कभी-कभी उनकी इस कार्यशैली से परेशान हो जाते थे। कॉटले ने अपने जीवन में केवल काम को तरजीह दी। इसका पता इस बात से भी चलता है कि उनकी पत्नी भी कॉटले के काम के जुनून से तंग आकर उन्हें छोड़कर वापस ब्रिटेन चली गई थी। कॉटले ने गंगनहर निर्माण के दौरान जब तक भारत में प्रवास किया तब या तो वे अपने काम में व्यस्त रहते थे या फिर पहाड़ों में घूमते थे और इस दौरान मृत पशुओं के अवशेष एकत्र करते थे। इस शौक में उनके साथ बॉटनिकल गार्डन सहारनपुर के सुपरिंटेंडेंट डॉ. हृयूम फाल्कनर भी थे। इन दोनों ने शिवालिक पहाड़ियों में अनेक जीवाश्म की खोज की। इसमें गैंडा, मगरमच्छ समेत स्तनपायी जीवाश्मों का दस फुट दांतों वाला हाथी, पंजे की तीन अंगुलियों वाले घोड़े के पूर्वज, शुतुरमुर्ग की हड्डी, विशालकाय सारस और कछुए आदि शामिल हैं। जब कॉटले गंगनहर का निर्माण पूरा कर वापस लंदन लौटे तो उन्हें और फाल्कनर को इस कार्य के लिए जियोलॉजिकल सोसायटी ने वोलास्टन मेडल से सम्मानित किया था। कॉटले ने अपने मित्र के साथ मिलकर 1846 में एटिका सिवालेसिस नामक पुस्तक भी लिखी। इस तरह कॉटले का जीवन अनेक रहस्यों से छिपा रहा।
दिन भर घोड़े पर चढ़कर किया सर्वे, रात को तैयार की ड्राइंग
उस समय आवाजाही का एकमात्र साधन घोड़े थे। कॉटले हरिद्वार से रुड़की तक के बीच घोड़े पर चढ़कर दिन भर गंगनहर के लिए जमीन का सर्वे करते थे, खुद ही जमीन की नाप आदि भी लेते थे। इसके बाद रात को लौटकर खुद ही ड्राइंग भी तैयार करते थे।
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