- श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में हुई संगोष्ठी
हरिद्वार। श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा में महर्षि दयानंद के योगदान विषय पर हुई अखिल भारतीय शोध संगोष्ठी आयोजित की गई। इस दौरान गुरुकुल करतारपुर के आचार्य उदयन ने कहा कि महर्षि दयानंद का मुख्य उद्देश्य वेदों के यथार्थ ज्ञान को जन सामान्य तक पहुंचाना रहा है। गुरुकुल प्रणाली, वेदों का अध्ययन, ब्रह्मचर्य का पालन, नारी शिक्षा, तर्क-आधारित शिक्षा और संस्कृत-हिंदी भाषा के माध्यम से चरित्र का निर्माण, रटने की अपेक्षा समझ पर जोर देना था।
हिंदू अध्ययन केंद्र दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. डॉ. ओमनाथ बिमली ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती का मुख्य उद्देश्य वैदिक ज्ञान के माध्यम से राष्ट्र का उत्थान, चरित्र निर्माण और सामाजिक समानता लाना था। कुलसचिव प्रो. सत्यदेव निगमालंकार ने बताया कि महर्षि एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था समाज में लाने चाहते थे जिससे ऐसे नवयुवकों का निर्माण हो, जो राष्ट्र के प्रति पूर्णतया समर्पित हो। आचार्य धनंजय ने कहा कि महर्षि दयानंद का उद्देश्य मैकाले की शिक्षापद्धति को नष्ट कर भारतीय शिक्षा पद्धति को लागू करना था, जो प्रकल्प ऋषिवर ने प्रारंभ किया था, वह आज भी गुरुकुलों के रूप में ऋषिवर के कार्य को निरंतर आगे बढ़ा रहा है। संगोष्ठी के अध्यक्ष प्रो. यशवीर सिंह ने कहा कि सभी मनुष्यों, विशेषतः आर्यों को वेदों में विश्वास कर धर्म की एकता का उत्थान करना चाहिए। स्वामी प्रणवानंद सरस्वती ने कहा कि वेदों की ओर लौटो का उद्धोष करने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती का संपूर्ण चिंतन वेदों से अनुप्रणीत है। सूत्र रूप में सभी ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा वेदों में प्राप्त हैं। इस मौके पर महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य डॉ. रवींद्र कुमार, डॉ. अंकुर कुमार आर्य आदि मौजूद रहे।