माना जाता है कि दुनिया से जिस्म जुदा हो जाए तो भी रूह और यादों के रूप में इंसान हमेशा अपनों की यादों में जिंदा रहता है। जुदाई के पल, यादगार चिह्न और निशानी कैसे विरासत का रूप अख्तियार कर लेते हैं, यह देखना हो तो अंग्रेजी हुकूमत में बनाए गए ऐतिहासिक कब्रिस्तान का रुख कर सकते हैं। वर्ष 1920 में राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा हासिल कर चुके इस कब्रिस्तान में 200 साल से ज्यादा पुरानी कब्रगाहों पर संगमरमर तराश कर की गई बेहतरीन नक्काशी इस बात की गवाही देती है कि दुनिया से जानों वालों के लिए लोगों के दिलों में कितना प्यार रहा होगा।
वैसे तो रुड़की में बंगाल सैपर्स, थॉमसन इंजीनियरिंग कॉलेज (अब आईआईटी), इंजीनियरिंग की मिसाल गंगनहर और पुल से गुजरती नहर (एक्वाडक्ट), सिंचाई अनुसंधान संस्थान, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई) जैसे कई नायाब हीरे हैं। इन सबके बीच इन संस्थानों से जुड़े लोगों की दफन हो चुकी यादों का जीता जागता नमूना पुराने कब्रिस्तान (ओल्ड सिमेट्री) के रूप में मौजूद है। अंग्रेजी हुकूमत के समय जब करीब दो सौ साल पहले रुड़की में गंगनहर का निर्माण किया गया और इसके लिए थॉमसन इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित किया गया, तब यहां काम करने वाले अंग्रेज अधिकारियों व इंजीनियरों ने रुड़की की सरजमीं में ही अपने आपको न्योछावर कर दिया।
गणेशपुर पुल के समीप स्थित पुराने कब्रिस्तान में उन्हीं अंग्रेज अधिकारियों और इंजीनियरों की कब्रगाहें आज भी मौजूद हैं। कब्रिस्तान में मौजूद सौ साल से अधिक पुरानी एक कब्र मोना नाम की युवती की भी है। इस पर पत्थर से परी के रूप में बनाई गई मूर्ति कई तरह के भाव प्रकट करती है। इसी तरह एक अन्य कब्रगाह पर परी हाथ में फूल लिए घुटने के बल बैठकर प्रार्थना करती दिखती है। कुछ कब्रगाहों के आगे संदेश लिखने के पत्थर की ही किताब बनाकर लोगों के परिचय उकेरे गए हैं। यहां हर कब्रगाह अपने आप में कुछ न कुछ कहती दिखाई देती है। संवाद
हरिद्वार जिले में है इकलौता कब्रिस्तान
आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने वर्ष 1920 में रुड़की के पुराने कब्रिस्तान की देखभाल का जिम्मा संभाला था। अभी तक हरिद्वार जिले में एकमात्र यही कब्रिस्तान है, जहां हरिद्वार समेत सभी क्षेत्रों के लोगों की कब्रें बनाई जाती है। हालांकि, एएसआई के हैंडओवर होने के बाद से यहां किसी कब्र को पक्का करने पर प्रतिबंध है। पहले की सभी कब्रगाहों का निर्माण सफेद संगमरमर के चमकते पत्थरों से किया गया है।
निधन की वजह का भी जिक्र
कब्रिस्तान में वर्ष 1860 की कई कब्रें मौजूद हैं। इन पर लगाए गए पत्थरों पर मृतक का नाम, उनकी जन्मतिथि और निधन की तिथि अंकित की गई है। कई कब्रों पर तो किन परिस्थितियों और किन कारणों में मौत हुई है, इसका भी जिक्र मिलता है।
ग्रैंड फादर की कब्र पर रो पड़ी थी इंग्लैंड की सैडविक
आईआईटी रुड़की में प्रोफेसर रहे फैडरिक विलियम्स की मृत्यु 1920 में हुई थी। जिनकी कब्र रुड़की स्थित पुराने कब्रिस्तान में स्थित है। करीब चार साल पहले आईआईटी में पहुंची शीला सैडिविक ने अपने ग्रैंड फादर के बारे में जानकारी ली तो उन्हें पता चला कि उनकी कब्र यहां मौजूद है। जब वे ग्रैंड फादर की कब्र पर पहुंची तो अपने आपको रोक नहीं पाई और फूट फूटकर रो पड़ी। इस तरह के कई वाकया इस कब्रिस्तान से जुड़े हुए हैं।