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समाज में दूसरी महिलाओं के लिए बन रही मिसाल

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रुढ़ीवादी परपंराओं को तोड़ आज महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। तीर्थनगरी में कई महिलाएं ऐसी हैं जो समाज और अन्य महिलाओं के लिए नजीर पेश कर रही है। कुछ महिलाएं समाज में जरुरतमंदों की मदद कर रही हैं, कुछ महिलाएं पौराणिक संस्कृति और परपंराओं को जीवंत कर रही हैं, तो कुछ महिलाएं पुरुषों के कदम से कदम मिलाकर परिवार का भरण पोषण करने में ई-रिक्शा चला रही हैं।
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सांस्कृृतिक विरासत को जीवंत कर रही कुसुम
श्यामपुर निवासी और मैत्री स्वयं सेवी संस्था की संस्थापक कुसुम जोशी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। बीते दो दशक से कुसुम नशा के खिलाफ अभियान में जुटी हुई है। समाज में उनके अभियान से लोग इतने प्रेरित हुए कि सैकड़ों लोगों ने अपने बेटी और बेटे के विवाह को शराब मुक्त बनाया है। यही नहीं कुसुम ने शराब मुक्त शादी करने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए नव विवाहित जोड़ों से पौधा रोपण भी करवाया है। अब वे उत्तराखंड की सांस्कृति विरासत को बचाने के लिए शादी विवाह जैसे समारोह में विलुप्त हो रही मांगल गीतों की भी प्रस्तुतियां दे रही हैं। नशे के क्षेत्र में प्रदेश सरकार और अन्य संस्थाओं की ओर से उन्हें कई सम्मान दिए जा चुके हैं।
- कुसुम जोशी, मैती स्वयंसेवी संस्था
नीरजा के हौंसले के आगे हारी दिव्यांगता
नीरजा के हौंसले के आगे उनकी दिव्यांगता भी हार गई है। दिव्यांग होने के बाद भी नीरजा गोयल ने कभी हिम्मत नहीं हारी। यह उनकी हिम्मत और हौंसला ही था कि वे एक पैरा खिलाड़ी के रुप में उभरकर सामने आई। खिलाड़ी बनने के बाद उनके दिल में समाज सेवा की भावना जागृत हुई। जिसके चलते उन्होंने नीरजा देवभूमि चेरिटेबल नामक एक संस्था खोली। इस संस्था के माध्यम से वह दिव्यांगों और जरुरतमंदों की हरसंभव मदद करने में जुटी रहती है। कोरोनाकाल में नीरजा और उनकी संस्था के सदस्यों ने जरुरतमंदों के लिए सैनेटाइज, मास्क, खाना आदि की व्यवस्था की थी। यही नहीं वह संस्था की ओर से समय- समय पर जरुरतमंद बच्चों को पाठय सामाग्री और खाद्य सामाग्री वितरित करती हैं, इसके अलावा वे जरुरतमंद और दिव्यांगों के लिए संस्था की ओर से व्हीलचेयर आदि का सहयोग करती हैं।
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नीरजा गोयल, नीरजा देवभूमि चैरिटेबल ट्रस्ट
परिवार के भरण पोषण के लिए संभाली ई- रिक्शा की कमान
मधु जोशी रायवाला क्षेत्र की एक ऐसी महिला के रुप में उबरकर सामने आई हैं, जिन्होंने रुढ़ीवादी परपंरा को तोड़ ई- रिक्शा की स्टेयरिंग संभाली है। मधु जोशी ने बताया कि कोरोनाकाल में परिवार का भरण पोषण करने के लिए उनके पास कोई रोजगार नहीं था। पति भी एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत थे। कोरोनाकाल में उनका काम भी छूट गया। परिवार को भरण पोषण करने के लिए उन्होंने ई- रिक्शा चलाना शुरू किया। जो अब उनकी दिनचर्या बन गई है। कहा वह रोज रायवाला से ऋषिकेश और फिर ऋषिकेश से रायवाला तक सवारियों को इधर-उधर ले जाती हैं।
मधु जोशी, ई रिक्शा चालक
जरुरतमंदों को दे रही नि:शुल्क शिक्षा
मूलरुप से सर्वोदय नगर कानपुर निवासी अलंकृता बनर्जी पशुलोक विस्थापित क्षेत्र में वर्ष 2013 से पंख द क्रियेटिव स्कूल संचालित कर रही है। इस विद्यालय में वह जरुरतमंदों को नि:शुल्क शिक्षा दे रही है। वर्तमान में उनके स्कूल में करीब 200 छात्र संख्या है। उत्तराखंड बोर्ड से मान्यता प्राप्त इस विद्यालय के बच्चे बड़े अंग्रेजी स्कूलों के बच्चों को मात देते हैं। अलंकृता बनर्जी ने बताया कि बचपन में ही मां का साया उठ गया था। कानपुर की प्रतिष्ठित व्यवसायी पिता एनएन बनर्जी की बीमारी में घर की पाई पाई खप गई। लंबी बीमारी के बाद पिता का साया भी छिन गया। उसके बाद उन्होंने कानपुर से ऋषिकेेश का रुख किया। पशुलोक विस्थापित में अपना घर बनाकर रहने लगी। मलीन बस्तियों के दो बच्चों की लड़ाई ने उनके जीवन को परिवर्तित कर दिया। परिणास्वरुप उन्होंने द पंख क्रियेटिव स्कूल खोलकर जरुरतमंदों को नि:शुल्क शिक्षा देने की ठानी।
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अलंकृता बनर्जी, पंख: द क्रिएटिव स्कूल
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