परमार्थ निकेतन में नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत अर्थ गंगा मॉडल पर आयोजित 14वीं गंगा जागरूकता एवं गंगा आरती प्रशिक्षण कार्यशाला का शुक्रवार को समापन हुआ। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित गंगा तट के पांच राज्यों से आए पुरोहितों, आचार्यों और गंगा सेवकों ने कार्यशाला में प्रतिभाग किया।
शुक्रवार को समापन अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि गंगा केवल भारत की सबसे बड़ी नदी ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आस्था है। उन्होंने कहा कि गंगा जी की आरती का वास्तविक अर्थ समाज के भीतर पर्यावरण चेतना का दीप जलाना है। स्वच्छता और संरक्षण के बिना पूजा पूर्ण नहीं हो सकती। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को गंगा आरती की पारंपरिक विधि, वैदिक मंत्रोच्चार, आध्यात्मिक अनुशासन, घाट प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, जल गुणवत्ता, अपशिष्ट प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, जनभागीदारी और अर्थ गंगा की अवधारणा पर विस्तृत प्रशिक्षण दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि गंगा संरक्षण समाज, संतों, युवाओं, स्वयंसेवी संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की सहभागिता से ही सफल हो सकता है। समापन अवसर पर प्रतिभागियों ने परमार्थ निकेतन के गंगा तट पर आयोजित गंगा आरती में सहभाग किया।