कार्बेट नेशनल पार्क के संरक्षित वन क्षेत्र स्थित निर्माण अवशेष 7वीं सदी के ही हैं। इनका नाता कत्यूरी शासनकाल के वैराट पत्तन से ही है।
अभी तक इन्हें ‘रिमेंस आफ एंसियेंट आर्किटेक्चर’ की श्रेणी में रखा गया था। तय किया जाना था कि 1920 में नोटिफाई हुए वैराट पत्तन अवशेषों से इनका लेना-देना है या नहीं।
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रिपोर्ट महानिदेशालय को भजी
आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) के दून सर्किल के अधिकारियों ने सर्वे के बाद इसकी पुष्टि कर दी है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट एएसआई के नई दिल्ली स्थित महानिदेशालय को भजी है।
अब इन्हें पुन: संरक्षित धरोहरों की सूची में शामिल किया जाए या नहीं, यह फैसला महानिदेशालय स्तर से ही होगा। इससे पहले सर्वे के लिए गई एएसआई की टीम को बैरंग लौटना पड़ा था, क्योंकि संरक्षित क्षेत्र में सर्वे की इजाजत नहीं थी।
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इसलिए जरूरत पड़ी सर्वे की
कुमाऊं स्थित द्वाराहाट के 16वीं सदी के कुटुंबरी देवी मंदिर समेत सहारनपुर स्थित खेड़ा की बनी और कार्बेट के इसी ‘रिमेंस आफ एंसियेंट आर्किटेक्चर’ के अस्तित्व को लेकर सवाल उठे थे।
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कहा गया था कि धरोहरों का अस्तित्व है ही नहीं और एएसआई के कागजों में संरक्षण हो रहा है। इसके अलावा सीमांकन में गड़बड़ी का भी मामला उठा था। इस पर एएसआई की तरफ से सर्वे के बाद गैर-मौजूद धरोहरों को डि-प्रोटेक्ट करने की कवायद शुरू हुई।
यह गलती भी होगी दूर
खेड़ा की बनी की गलती भी दूर की जाएगी। आगरा सर्किल से जब दून सर्किल की सीमाएं जुदा हुईं तो यह स्थान सहारनपुर की बेहट तहसील के हिस्से आया, लेकिन कागजों में इसका संरक्षण अभी तक हरिद्वार जिले में किया जा रहा है।
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इनका है कहना
सर्वे रिपोर्ट महानिदेशालय को भेज दी गई है, अब इस पर निर्णय वहीं से लिया जाना है।
- अतुल भार्गव, सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलाजिस्ट, एएसआई (दून सर्किल)।