जैव विविधता के अध्ययन के लिए पिथौरागढ़ में खलियाटॉप की बुग्यालों की टोह ले रहे मोनाल संस्था के सदस्यों को हिमालय वेजल और पाइका के दर्शन हो गए।
यह दोनों जीव हिमालयी क्षेत्र में बेहद दुर्लभ हैं जो कभी-कभार ही नजर आते हैं। हिमालय वेजल के बारे में बताया गया है कि यह बहुत तेज भागता है। एक स्थान पर ज्यादा देर तक नहीं रुकता। मोनाल संस्था के अध्यक्ष बृजेश धर्मशक्तू और सचिव सुरेंद्र पंवार ने बताया कि खलियाटॉप में हिमालयन वेजल के मिलने से साबित होता है कि यह इलाका शिकारियों से सुरक्षित है।
हिमालय वेजल के बारे में कहा गया है कि यह अपने से छोटे आकार के जीवों को मार खाता है। पाइका इसका सबसे पसंदीदा जीव है। आकार में छोटा होने के कारण हिमालय वेजल को चील और उल्लू जैसे पक्षियों से गंभीर खतरा रहता है। हिमालयन वेजल उदविलाव जैसा दिखता है।
खलियाटॉप में दूसरा दुर्लभ जीव पाइका देखा गया। यह बिना पूंछ वाला खरगोश जैसा दिखता है। पायका बुग्यालों के आसपास चट्टानों में घर बनाता है। वह घास, पत्तियों, बुग्यालों में मिलने वाले बीजों से पेट भरता है। खूबसूरत किस्म के इस जीव को खतरे बहुत ज्यादा हैं। हिमालयन वेजल तो पाइका के पीछे पड़ा रहता है।
मोनाल की टीम ने इन जीवों के स्वभाव, खानपान पर गहन अध्ययन किया है। साथ ही इनके मिलने के स्थानों की जानकारी जुटाई है। इसकी पूरी रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी ताकि इनके संरक्षण के लिए कदम उठाए जा सकें।
खलियाटॉप में इस समय खिलता है सफेद बुरांश
निचली घाटी वाले इलाकों में मिलने वाले बुरांश के फूल का रंग लाल एवं सुर्ख होता है, लेकिन खलियाटॉप के जंगलों में सफेद बुरांश पाया जाता है। यह बुरांश अप्रैल के दूसरे सप्ताह से खिलने लगता है। जानकारों का कहना है कि सफेद बुरांश में लाल बुरांश से भी ज्यादा गुणकारी तत्व होते हैं।
आयुर्वेद एमडी डा. नवीन जोशी ने बताया कि लाल बुरांश हृदय रोग में बेहद कारगर होता है। कम मात्रा में और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने के कारण इसके जूस को बनाने का प्रयास लोग नहीं करते। सफेद बुरांश का पौधा लाल बुरांश की तरह ही होता है, लेकिन उसमें फूल सफेद आते हैं।
मोनाल संस्था करेगी लोगों को जागरूक
मोनाल संस्था के अध्यक्ष बृजेश धर्मशक्तू और सचिव सुरेंद्र पंवार ने कहा कि उनकी संस्था वन्यजीवों और वनस्पतियों के संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करेगी। जीवों, पक्षियों के प्रति लोगों का संवेदनशील रहना जरूरी है। तभी हिमालयी क्षेत्रों में इनको बचाया जा सकता है।