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बाघ के चीर-फाड़ का 'वीडियो'

Wed, 28 Aug 2013 04:39 PM IST
अमर उजाला, नैनीताल
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बाघों के पोस्टमार्टम को महज खानापूर्ति समझ निपटा भर लेना अब और दिन तक नहीं चल सकेगा। ऐसा करने पर हाईकोर्ट का आदेश वन विभाग को कटघरे में खड़ा करवा सकता है।
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हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को आदेश दिया है कि बाघों के पोस्टमार्टम के दौरान राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की ओर से निर्धारित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का ध्यान रखा जाए।

करनी होगी वीडियोग्राफी
साथ ही टीम नियुक्त कर पूरी तरह वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी, फिंगरप्रिंटिग और अन्य सबूतों को ध्यान में रखते हुए जांच की जाए। अदालत ने सरकार को इस मामले में चार सप्ताह के भीतर शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
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मुख्य न्यायाधीश बारिन घोष एवं न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार गुप्ता की संयुक्त खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। देहरादून निवासी गौरी मौलखी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि उत्तराखंड में लगभग 96 बाघ और तेंदुए 2012-13 में मारे गए।

मानकों को रखा ताक पर
लेकिन वन विभाग इनका पोस्टमार्टम मानकों को ताक पर रखकर कर रहा है। याचिका में कहा गया कि 24 मई को कार्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) रामनगर के बिजरानी रेंज में मृत मिली बाघिन के मौत के कारणों की जांच तय मानकों के अनुरूप की गई और ना ही उसकी मौत की फर्द बरामदगी बनाई गई।

पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि प्रत्येक बाघ की मौत या उसके शिकार का अंदेशा होने पर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा निर्धारित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर के तहत जांच टीम नियुक्त की जाए।

लेने होगें फिंगरप्रिंट
इसके अलावा टीम नियुक्त कर पूरी तरह वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी, फिंगरप्रिंटिग और अन्य सबूतों को ध्यान में रखते हुए जांच की जाए। न्यायालय ने सरकार को इस मामले में चार सप्ताह के भीतर शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश भी दिए हैं।
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