पिथौरागढ़। कुमाउनी मासिक पत्रिका आदलि कुशलि की पहल परआयोजित चौथे कुमाउंनी भाषा सम्मेलन में कुमाऊं, गढ़वाल, दिल्ली और नेपाल से 90 लोक भाषा विद और साहित्यकार पहुंचे। नौ सत्रों में गहन चर्चा परिचर्चा के बाद कुमाउंनी और गढ़वाली भाषा को भारत सरकार की भाषा नीति 1971 के परिप्रेक्ष्य में संविधान की आठवीं अनुसूची में लाने का प्रस्ताव एक स्वर में पारित किया और सोर संकल्प पत्र जारी किया।
वक्ताओं का कहना था कि किसी भी राज्य की समृद्ध संस्कृति रोजगार के अवसर बढ़ाने और निरंतर विकास के लिए दुदबोलियों का संरक्षण, संवर्धन और शैक्षिक माध्यम भाषा बनना आवश्यक है। सरकार की प्राथमिकता रुचि और भागीदारी के बिना यह संभव नहीं है।
वक्ताओं ने चिंता जाहिर की कि भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति 2020 में स्थानीय भाषाओं को शैक्षिक माध्यम भाषा बनाने का प्रावधान तो कर दिया लेकिन क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। आयोजन समिति ने संकल्प लिया कि सोर संकल्पपत्र को राज्य सरकार के माध्यम से भारत सरकार तक पहुंचाया जाएगा और सामाजिक दबाव समूहों के माध्यम से दुदबोली आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा। इस संदर्भ में जन संचार माध्यमों से भी सक्रिय सहयोग की अपील की गई।
जन-जागरूकता के लिए इस सम्मेलन के दौरान जनगणना के दौरान कुमाउंनी, गढ़वाली सहित अन्य लोकभाषाओं को जनगणना प्रपत्रों पर दर्ज करने की अपील की गई। नई पीढ़ी को कुमाउंनी से जोड़ने के लिए पिथौरागढ़, चम्पावत, अल्मोड़ा के विद्यालयों में मैं लेकै बोलि सक्छु कुमाउंनी थीम पर विद्यार्थियों के बीच कुमाउंनी में भाषण, कहानी वाचन, कविता वाचन और ऐपन प्रतियोगिताएं कराई गईं।
आयोजन समिति ने प्रत्येक जनपद की सभी प्रतियोगिताओं में प्रथम, द्वितीय, तृतीय स्थान पाने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कार और प्रमाणपत्र देकर प्रोत्साहित किया। दो दिवसीय चिंतन के साथ लोकभाषा कवि सम्मेलन, लोक संगीत संध्या और सम्मेलन स्थल पर कुमाउंनी लोक संस्कृति, लोकसाहित्य, चित्रकला की प्रदर्शनियों और कुमाउंनी खानपान ने लोक पहचान को नए आयाम दिए।