सोर (पिथौरागढ़) के आराध्य देवता भगवान मोस्टामानू का ऐतिहासिक मेला शुरू हो गया है। शुक्रवार को भगवान मोस्टामानू का डोला निकलेगा। उद्घाटन अवसर पर बृहस्पतिवार को महिलाओं और बालिकाओं ने कलश यात्रा निकाली। इस दौरान रंगारंग कार्यक्रम भी हुए।
मेले का उद्घाटन पूर्व विधायक मयूख महर ने किया। महिलाओं ने आदर्श कन्या विद्यालय मोस्टामानू मंदिर परिसर से मोस्टामानू मंदिर तक कलश यात्रा निकाली। इसमें हलपाटी, गौणियागांव, बकरकटिया, ढुंगा, छेड़ा, धारीगांव की महिलाएं और बालिकाएं शामिल थीं। थलकेदार सांस्कृतिक मंच, संगीत कला परिषद के कलाकारों और रोड़ीपाली, गोरंगचौड़, मोस्टामानू स्कूल के छात्र-छात्राओं ने रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए। गायक कलाकार कैलाश कुमार और दृष्टिहीन गायक सुंदर बाफिला के गीतों पर दर्शक खूब झूमे।
मुख्य अतिथि के साथ ही विशिष्ट अतिथि डीएम सी रविशंकर, एसपी रामचंद्र राजगुरु, ब्लॉक प्रमुख अंजू लुंठी, कांग्रेस नेता दीपक लुंठी, पूर्व पालिकाध्यक्ष राजेंद्र रावत, निवर्तमान पालिकाध्यक्ष जगत सिंह खाती, व्यापार मंडल अध्यक्ष शमशेर महर, ठेकेदार प्रकाश जोशी का मंदिर कमेटी के संयोजक विरेंद्र बोहरा, अध्यक्ष भगवान सिंह बिष्ट और पदाधिकारियों ने आभार जताया।
पदाधिकारियों ने कहा कि आयोजन में वित्त मंत्री प्रकाश पंत और मेला कमेटी के संरक्षक भूपेश पंत का विशेष सहयोग मिल रहा है। शुक्रवार को मोस्टामानू का मुख्य मेला होगा। दोपहर में भगवान मोस्टामानू का भव्य डोला निकलेगा। देव डांगरों का अवतरण होगा। मेले का समापन 15 सितंबर को होगा।
मेले में लगे सरकारी विभागों के स्टाल
मोस्टामानू मेले में विभिन्न विभागों के स्टाल लगे हैं। इनमें सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जा रही है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत स्वास्थ्य कैंप लगाया गया है। मेले में राजस्थान से भी व्यापारी पहुंचे हैं। मेले के चलते मंदिर परिसर में रौनक बनी है।
बारिश के देवता हैं भगवान मोस्टामानू
पिथौरागढ़। छह पट्टी सोर के आराध्य देवता भगवान मोस्टामानू (मोस्टामाणू) को बारिश का देवता माना जाता है। मेले के दौैरान भगवान मोस्टामानू का डोला निकलते समय अक्सर बारिश होती है। यह वर्षभर अच्छी बारिश का प्रतीक माना जाता है। जिला मुख्यालय के पास चंडाक में भगवान मोस्टामानू का प्राचीन मंदिर है। भगवान मोस्टामानू की बारिश के देवता के रूप में मान्यता है। लोगों का मानना है कि भगवान मोस्टामानू के प्रसन्न होने पर पर्याप्त बारिश होती है और फसल की अच्छी पैदावार होती है। जब भी कभी इलाके में बारिश नहीं होती है तो लोग भगवान मोस्टामानू की आराधना करते हैं। 108 घड़े पानी से भगवान मोस्टामानू का जलाभिषेक किया जाता है। मंदिर में हर वर्ष मेला लगता है। इस दौरान निकलने वाले डोले का आशीर्वाद लेने के लिए जिला मुख्यालय के साथ ही कई हिस्सों से लोग पहुंचते हैं। हजारों लोगों का हुजूम देवडांगरों का आशीर्वाद लेता है। मंदिर में वर्षभर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। खेतों में अनाज पैदा होेने पर सबसे पहले भगवान मोस्टामानू को चढ़ाने की परंपरा आज भी है। सरकारी मदद से मंदिर परिसर में सुविधाएं जुटाई गई हैं। ऊंची पहाड़ी पर स्थित भगवान मोस्टामानू का मंदिर सुकून और शांति की अनुभूति कराता है। यहां से हिमालय के भी अद्भुत दर्शन होते हैं।