पिथौरागढ़। आंध्र प्रदेश में हर माह 40 हजार रुपये कमाने वाले लाल बाबू कोरोना काल में मजदूरी करने के लिए मजबूर हैं। कोरोना के कारण नौकरी छूटने पर वे जुलाई पिथौरागढ़ आकर मजदूरी करने लगे। इसकी जानकारी घर वालों को नहीं दी गई है।
जिला मोतिहारी बिहार के ग्राम बिसुनापुर मैतियारवा निवासी 23 वर्षीय लाल बाबू अप्रैल 2015 से आंध्र प्रदेश में श्री लक्ष्मी परसना पेपर मिल पाल मौरो में सुपरवाइजर थे। उनकी देखरेख में 18 कर्मी काम करते थे। वहां उनका काम अच्छा रहा।
जिसे देखते हुए मिल स्वामी ने उनका वेतन 40 हजार रुपये मासिक कर दिया। पेपर मिल की उन्नति और उसे आगे बढ़ाने के लिए कर्मियों और मालिक के बीच उन्होंने सेतु की तरह काम किया।
वर्ष 2020 में कोरोना की पहली लहर के कारण उनके कई साथी बेरोजगार होते रहे, लेकिन लाल बाबू की नौकरी चलती रही। वर्ष 2021 में कोरोना की दूसरी लहर ने लाल बाबू का रोजगार छीन लिया।
अप्रैल 2021 में उन्हें लौटना पड़ा लेकिन उन्होंने रोजगार छिनने की भनक परिवार को नहीं लगने दी। कुछ दिन घर रहने के बाद उन्होंने पिथौरागढ़ में मजदूरी करने वाले अपने गांव के साथियों से संपर्क कर मजदूरी करने की बात कही। इसके बाद वे जुलाई में पिथौरागढ़ आ गए। तब से वे दैनिक मजदूरी कर रहे है।
चार भाइयों के परिवार में दूसरे नंबर के हैं लाल बाबू
पिथौरागढ़। लाल बाबू के घर में कुल आठ लोग हैं। चार भाइयों में दूसरे नंबर के हैं। परिवार में एक बहन, माता पिता, भाभी और एक भतीजा भी है। उन्होंने छोटी सी उम्र में ही अपने लिए रोजगार ढूंढ लिया था।
बेरोजगार होने से परिवार पालने की चिंता ने उन्हें मजदूर बनने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने रोजगार छिन जाने की बात परिजनों को नहीं बताई है। माता-पिता को भी नहीं पता कि उनका सुपरवाइजर बेटा अब मजदूरी करने लगा है।