भक्त दर्शन पांडेय
पिथौरागढ़। नेपाल सीमा से लगे ज्यादातर गांव सड़क से जुड़ चुके हैं। चीन सीमा पर स्थित लिपुलेख तक भी सड़क पहुंच चुकी है लेकिन धारचूला विधानसभा क्षेत्र के कनार और मेतली गांवों के लोगों के लिए आज भी सड़क एक सपने की तरह है। बीमार और बुजुर्गों को अस्पताल पहुंचाने के लिए डोली ही एकमात्र सहारा होती है। 10 से 16 किलोमीटर की पैदल दूरी तय कर सड़क तक पहुंचने वालीं यहां की लगभग चार हजार की आबादी की पीड़ा बरसात में और गहरा जाती है, जब क्षेत्र के पैदल रास्ते आपदा में बह जाते हैं।
चुनावों में सड़क बनाने के वादे तो हर बार होते हैं लेकिन इन गांवों तक सड़क नहीं पहुंची। हाल में संचार सेवा शुरू तो हुई है लेकिन अब भी डाक विभाग पर निर्भरता है। चिट्ठी-पत्री सहित अन्य डाक के लिए हरकारा रोज निकटतम कस्बे बरम पहुंचता है। यहां से वह एक दिन पहले का समाचार पत्र भी गांव ले जाता है। तब जाकर ग्रामीणों को एक दिन पूर्व हुई घोषणाओं, वादों और घटनाओं की जानकारी मिल पाती है।
माचिस लाने में ही बीत जाता है दिन
बंगापानी तहसील के कनार गांव में लगभग 800 की आबादी है। इस गांव तक पहुंचने के लिए बरम कस्बे से 16 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। गांव तक पहुंचने के लिए बियाबान जंगल से होते हुए खड़ी चढ़ाई पार करनी पड़ती है। गांव से बरम आने के लिए ढलान पर उतरना होता है। गांव में दुकानें नहीं हैं। ग्रामीणों को माचिस से लेकर नमक-चीनी के लिए बरम आना पड़ता है। ऐसे में उनका एक दिन पूरा बर्बाद हो जाता है। यदि किसी को तहसील, ब्लाक या फिर जिला मुख्यालय जाना होता है तो बरम से ही वाहन पकड़ने होते हैं।
कई बार बीमारों को अस्पताल पहुंचाने के लिए नहीं मिले लोग
बरम गांव में किसी के बीमार पड़ने या फिर गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होने पर उन्हें डोली में रखकर बरम पहुंचाना होता है। गांव से बीमार और गर्भवती महिलाओं को डोली में रखकर लाने-ले जाने के लिए अधिक युवाओं की जरूरत पड़ती है। कई बार लोग भी नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। गांव में प्रसिद्ध कोकिला देवी का मंदिर भी है। प्रतिवर्ष यहां पूजा अर्चना करने के लिए जिले भर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ग्रामीण वर्षों से गांव तक सड़क का निर्माण कर धार्मिक पर्यटन से जोड़ने की मांग भी करते रहे हैं लेकिन आज तक सड़क नहीं बन सकी है। ऐसे में पैदल चलना ही ग्रामीणों की नियति बन चुकी है।
मेतली के ग्रामीणों को चलना पड़ता है दस किलोमीटर
पिथौरागढ़। बंगापानी तहसील का मेतली गांव भी सड़क से नहीं जुड़ पाया है। यहां के ग्रामीण सड़क की मांग को लेकर कई बार आंदोलन कर चुके हैं लेकिन गांव तक सड़क नहीं बन सकी है। सड़क से गांव तक पहुंचने के लिए दस किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। कांग्रेस सरकार में मेतली के लिए कुछ किलोमीटर सड़क कटिंग भी हुई लेकिन सड़क का लाभ जनता को नहीं मिल सका। ग्रामीणों का कहना है कि उनके गांव में सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है। ग्रामीण जारा नामक स्थान से गांव तक सड़क की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि जारा से सड़क बनने पर अधिक से अधिक जनता को लाभ मिलेगा। सभी ग्रामीणों के पास मोबाइल हैं लेकिन सिग्नल ठीक से नहीं आते हैं। ऐसे में कई बार लोगों को बातचीत के लिए घरों से बाहर आना पड़ता है या ऐसी जगह तलाशनी पड़ती है जहां पर सिग्नल आते हों। ऐसे में बेहतर इंटरनेट की बात करना भी हास्यास्पद होगा।
बरसात में बढ़ जाती हैं ग्रामीणों की मुश्किलें
पिथौरागढ़। कनार और मेतली गांव के लोगों की मुश्किलें बरसात में और अधिक बढ़ जाती हैं। ग्रामीणों ने बताया कि हर साल बरसात में गाड़-गधेरों के उफान पर आने से रास्ते बह जाते हैं। इसके बाद फिर रास्तों का सुधार होने तक जान जोखिम में डालकर आवाजाही करनी पड़ती है। गांव तक पहुंचने के लिए कुछ स्थानों पर लकड़ी के कच्चे पुल भी बनाने पड़ते हैं। जंगल से गुजरने वाले इन रास्तों में जंगली जानवरों का भी भय बना रहता है।
क्या कहते हैं लोग
सुविधाओं के नाम पर मेतली गांव में कुछ भी नहीं है। जरूरत का सामान पीठ पर रखकर गांव तक पहुंचाना पड़ता है। कई परिवार सुविधाओं के अभाव में पलायन कर चुके हैं। सड़क का शीघ्र निर्माण होने के बाद ही ग्रामीणों को राहत मिलेगी। - मान सिंह बिष्ट।
इस क्षेत्र में अस्पताल नहीं है। किसी के बीमार होने पर उसे डोली से अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। पैदल रास्ते भी बदहाल हैं। क्षेत्र की संचार सेवा ठीक नहीं है। जारा से सड़क बनने के बाद ही ग्रामीणों को हर तरह की सुविधा मिल सकती है। - मनोहर सिंह बिष्ट।