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अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य के पारिस्थतिकी संवेदी जोन से मुक्त सभी 722 गांव

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पिथौरागढ़। अस्कोट वन्यजीव विहार के इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) में शामिल सभी गांवों को इस दायरे से मुक्त कर दिया गया है। इसकी अंतिम अधिसूचना जारी कर दी गई है।
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ईएसजेड से गांवों के हटने के बाद विकास कार्यों के लिए बाधा नहीं होगी। लोग लंबे समय से ईएसजेड में शामिल गांवों को हटाने की मांग कर रहे थे। यह प्रदेश का पहला ऐसा ईएसजेड होगा, जिसमें एक भी गांव शामिल नहीं है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मांग और तत्कालीन डीएफओ डॉ. विनय भार्गव के विशेष प्रयासों से अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य के ईएसजेड की अंतिम अधिसूचना जारी हो गई है।
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इसमें एक भी गांव को शामिल नहीं किया गया है। पहले इसमें करीब 722 गांव शामिल थे। ईएसजेड होने के कारण इन गांवों में विकास कार्य होने में बाधा पड़ रही थी। लोग लंबे समय से ईएसजेड से गांवों को हटाने की मांग कर रहे थे।
इस अभयारण्य की स्थापना 600 वर्ग किमी क्षेत्र में की गई थी। अभयारण्य बनाने का मूल उद्देश्य क्षेत्र में वनस्पतियों और वन्यजीवों की वृहद जैवविविधता का संरक्षण करना था। ईएसजेड का विस्तार अभयारण्य की सीमा के चारों ओर शून्य से 22 किमी तक है। इसका क्षेत्रफल 454.65 वर्ग किमी है।
अंतरराष्ट्रीय सीमा के कारण अभयारण्य के पूर्वी, दक्षिणी और पश्चिमी भागों की ओर ईएसजेड का शून्य विस्तार है जबकि अन्य स्थानों पर क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय समुदाय और आदिम आदिवासी समूहों (वन राजि) के साथ सार्वजनिक परामर्श के कारण शून्य विस्तार है। इस प्रकार यह प्रदेश का ऐसा पहला ईएसजेड बनाया गया है, जिसमें एक भी गांव शामिल नहीं है।
अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य में कई दुर्लभ वन्यजीव
पिथौरागढ़। अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना वर्ष 1986 में हुई थी। यह 600 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैला है। यहां मुख्य रूप से हिम बाघ, भालू, बर्फ का भालू, भरल, थार, कस्तूरी मृग, पक्षियों में कोकलास, फीजेंट, मोनाल, पहाड़ी तीतर, हिमालयन स्नो कॉक, ट्रेगोपान पाए जाते हैं। यहां सर्वाधिक 67 कस्तूरी मृग भी पाए जाते हैं।
अस्कोट वन्यजीव अभयारण्य के ईएसजेड में अब एक भी गांव शामिल नहीं है। यह प्रदेश का पहला ऐसा ईएसजेड होगा, जिसमें एक भी गांव शामिल नहीं है। - डॉ. विनय भार्गव, आईएफस अधिकारी।
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