पिथौरागढ़। सीमांत जिले के लोगों को बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं से मुक्ति नहीं मिल रही है। जिला अस्पताल में जंग खा रही ढाई करोड़ की लिथोट्रिप्सी मशीन इसका प्रमाण है। वर्ष 2016 में खरीदी गई मशीन सिर्फ तीन साल में जवाब दे गई। खराब मशीन को ठीक करने के प्रयास नहीं हुए। मशीन स्टोर रूम में बंद है और लोग पथरी के उपचार के लिए हल्द्वानी, बरेली या निजी अस्पतालों की दौड़ लगाने के लिए मजबूर हैं।
सीमांत जिले के लोगों को स्थानीय स्तर पर बगैर ऑपरेशन के पथरी का उपचार मिल सके इसके लिए वर्ष 2016 में ढाई करोड़ रुपये से लिथोट्रिप्सी मशीन खरीदी गई थी। तीन साल संचालित होने के बाद मशीन स्वास्थ्य विभाग और लोगों का साथ छोड़ गई। मशीन में खराबी आने से इसे स्टोर रूम में बंद कर दिया गया लेकिन इसे ठीक करने के प्रयास नहीं हुए। जिला अस्पताल में हर महीने औसतन 80 से अधिक मरीज पथरी की दिक्कत से जूझते हुए पहुंचते हैं। लिथोट्रिप्सी मशीन का संचालन न होने से मरीजों को हायर सेंटर रेफर किया जा रहा है। ऐसे में मरीज बगैर ऑपरेशन पथरी निकलवाने के लिए हल्द्वानी, बरेली की दौड़ लगाने के लिए मजबूर हैं। संचालन न होने से करोड़ों की मशीन जंग खा रही है और स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के दावे हो रहे हैं। संवाद
निदेशालय को कंपनी को कई बार भेजे जा चुके हैं पत्र
पिथौरागढ़। करोड़ों रुपये से खरीदी गई मशीन के सीमांत के लोगों के लिए कोई मायने नहीं है। अस्पताल प्रबंधन ने मशीन की खराबी को दूर करने के लिए बीते पांच सालों में 20 से अधिक बार निदेशालय और कंपनी को पत्र भेजा है। सभी पत्र सरकारी फाइलों में सिमटकर रह गए हैं।
कोट
लिथोट्रिप्सी मशीन में खराबी आने से इसका संचालन बंद है। खराबी को दूर करने के लिए निदेशालय और कंपनी को पत्राचार किया गया है। खराबी दूर होने के बाद ही इसका संचालन संभव है। - डॉ. जेएस नबियाल, पीएमएस, जिला अस्पताल, पिथौरागढ़।