पिथौरागढ़। सीमांत जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के दावे तो खूब हो रहे हैं जो धरातल पर बेअसर हैं। सरकारी फाइलों में दम तोड़ रहा ट्राॅमा सेंटर का प्रस्ताव इसका प्रमाण है।
सीमांत जिले में ट्राॅमा सेंटर सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रहा है और दुर्घटना में घायल अपनी जान बचाने के लिए हायर सेंटर की दौड़ लगाने के लिए मजबूर हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि बीते दो साल में विभिन्न दुर्घटनाओं में घायल 120 लोगों को ट्राॅमा सेंटर के अभाव में हायर सेंटर रेफर किया गया।
चिंताजनक बात है कि हायर सेंटर पहुंचने से पहले की 15 घायलों ने रास्ते में दम तोड़ दिया। आपदा की दृष्टि से संवेदनशील सीमांत जिले में आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं। दुर्घटना में घायलों की जान बचाने के लिए जिले में राज्य गठन के बाद से ही ट्राॅमा सेंटर की मांग की जा रही है।
राज्य गठन के 26 साल बाद भी ट्रामा सेंटर बनाने के प्रयास नहीं हुए। हालांकि इसकी घोषणा की गई। बाकायदा अप्रैल 2017 में भ्रमण पर पिथौरागढ़ पहुंचे तत्कालीन मुख्यमंत्री ने जनता दरबार में शामिल होकर ट्राॅमा सेंटर खोलने का दावा कर डेढ़ करोड़ रुपये मंजूर करने का वादा किया था।
आज तक ट्राॅमा सेंटर का पता नहीं है। ट्राॅमा सेंटर खोलने का विभागीय प्रस्ताव भी सरकारी फाइलों में धूल फांक रहा है और दुर्घटना में घायल अपनी जान बचाने के लिए हल्द्वानी, बरेली की दौड़ लगा रहे हैं।