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परंपरागत रिंगाल हस्तशिल्प को मिली सजावटी सामान की संजीवनी

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रिंगाल से बनाए गए घरेलू उपयोग के सामान। - फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। पहाड़ में खेती और पशुपालन के सिमटने से संकट में आए परंपरागत रिंगाल उद्योग को सजावटी सामान की संजीवनी मिल गई है। उत्तरापथ सेवा संस्था के प्रयासों से अब रिंगाल से बनने वाले सूप, मोस्टे और डोके की जगह आकर्षक सजावटी सामान ने ली है। रिंगाल से पहले जहां केवल पांच या छह प्रकार का सामान बनाया जाता था वहीं अब 150 से अधिक प्रकार का सामान बनाया जा रहा है। बाजार में इसकी अच्छी मांग के चलते रिंगाल हस्तशिल्प के कारोबार से जुड़े सैकड़ों परिवारों की आजीविका इसी परंपरागत हुनर से फिर से चलने लगी है।
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उत्तराखंड में बहुतायत पाए जाने वाले रिंगाल का खेती और पशुपालन से संबंधित सामग्री बनाने में उपयोग होता था। रिंगाल से मुख्य रूप से सूप, डोके/डलिया और मोस्टे बनाए जाते थे। इस हस्तशिल्प से मुनस्यारी के सबसे अधिक परिवार जुड़े थे। मुनस्यारी में डोके, सूप और मोस्टे बनाने वाले हस्तशिल्पी जिलेभर के गांवों में जाकर रिंगाल से बनी सामग्री बेचते थे। पहाड़ में खेती और पशुपालन का कामकाज सिमटा तो रिंगाल से गुजर-बसर करने वाले हस्तशिल्पी परिवारों की आजीविका पर भी संकट आ गया। हालात यह हो गए कि पिछले डेढ़ से दो दशक के भीतर 50 फीसदी लोगों को अपने इस परंपरागत शिल्प को हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा, लेकिन उत्तरापथ सेवा संस्था के प्रयासों से इस रिंगाल उद्योग को एक बार फिर नई संजीवनी मिल गई है। पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नेशनल मिशन ऑफ हिमालयन स्टडीज, जीबी पंत पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान कोसी कटारमल अल्मोड़ा के सहयोग से उत्तरा सेवा संस्था ने उत्तराखंड के इस परंपरागत रिंगाल हस्तशिल्प को नई पहचान देने के प्रयास किए हैं। इस समय मुनस्यारी की 62 महिलाएं रिंगाल का सजावटी सामान बना रही हैं। संस्था की ओर से प्रशिक्षित किए गए 50 लोग स्वयं बाजार में अपने उत्पाद बेच रहे हैं।
घोंसले से लेकर झूमर तक बन रहे रिंगाल से
पिथौरागढ़। उत्तरापथ सेवा संस्था की कार्यशाला में इस समय छह महिला पुरुष काम कर रहे हैं। यहां पक्षियों के घोंसले, फूलदान, पूजा टोकरी, फाइल फोल्डर, लैंप, सर्विस टोकरी, झूमर, झाड़ू, कूड़ेदान, पैन स्टेंड से लेकर 150 प्रकार के सामान तैयार कर रहे हैं। मांग पर कुर्सी और सोफासेट भी बनाए जा रहे हैं।
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सेना के जवानों की कलाइयों पर सजी थी रिंगाल की राखियां
पिथौरागढ़। वर्तमान में संस्था से जुड़ी मुनस्यारी की 62 महिलाएं रिंगाल से बेहद खूबसूरत सजावटी सामान बना रही हैं। इन महिलाओं ने रिंगाल से सात हजार राखियां भी बनाई थीं। इन राखियों को सहकारिता के माध्यम से सेना के जवानों को भेजा गया था। खूबसूरत अंगूठी, कलाई में बांधे जाने वाले आकर्षक बैंड भी यह महिलाएं बना रही हैं।
150 हस्तशिल्पी मास्टर ट्रेनर तैयार कर रही संस्था
पिथौरागढ़। सजावटी सामान बनाने के लिए मास्टर ट्रेनर परंपरागत हस्तशिल्पी और अन्य लोगों को प्रशिक्षण देते हैं। उत्तरापथ सेवा संस्था के परियोजना समन्वयक पंकज कार्की ने बताया कि संस्था की इस कारोबार में अधिकतम लोगों को प्रशिक्षित कर रोजगार से जोड़ने की योजना है। इसके लिए उत्तरापथ सेवा संस्था शीघ्र ही 150 मास्टर ट्रेनर तैयार करेगी। अभी संस्था के पास केवल छह हस्तशिल्पी मास्टर ट्रेनर ही हैं।
रिंगाल उत्तराखंड का प्रमुख हस्तशिल्प है। पहले रिंगाल से सूप, डोका और मोस्टा बनाए जाते थे। यह सामान अब नहीं बिकता है। इसको देखते हुए संस्था ने इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को फैंसी सामग्री बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बाजार में इसकी अच्छी मांग है। रिंगाल हस्तशिल्प को उत्तराखंड में फिर से अच्छी पहचान मिलेगी।
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- राजेंद्र पंत, संस्थापक उत्तरापथ सेवा संस्था मुवानी, पिथौरागढ़।
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