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जौलजीबी मेले में उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रहा कारोबार

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जौलजीबी मेले में ग्राहकों का इंतजार करते व्यापारी। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : PITHORAGARH
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जौलजीबी (पिथौरागढ़)। जौलजीबी का ऐतिहासिक व्यापारिक मेला इस साल फीका रहा। कोरोना के चलते एक साल बाद हुए मेले में व्यापारियों की उम्मीद के अनुरूप कारोबार नहीं हुआ। इससे देशभर से आने वाले व्यापारी काफी निराश रहे।
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काली-गोरी नदी के संगम पर लगने वाला जौलजीबी मेला पिथौरागढ़ जिले का प्रमुख मेला है। मेले में हर वर्ष 100 से अधिक व्यापारिक दुकानें लगती हैं। व्यापार के लिए स्थानीय व्यापारियों के साथ ही लुधियाना, उत्तर प्रदेश से भी व्यापारी पहुंचते हैं। स्थानीय उत्पादों के साथ ही तिब्बत के गर्म कपड़े समेत अन्य उत्पाद बिक्री के लिए लाए जाते हैं।
मेले में ऊनी चुटके, थुलमे, दन, मफलर, स्वेटर, पंखी, चौर गाय की पूंछ, जूतों का बड़ा कारोबार होता है। बर्तन, कृषि यंत्र, नेपाल से आने वाला शहद और घी की भी अच्छी मांग रहती है। वर्ष 2020 में कोरोना के कारण यह मेला आयोजित नहीं हो सका। इस साल मेला लगा लेकिन खरीदार सीमित संख्या में पहुंचे।
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‘प्रशासन ने अधिक लिया सुविधा शुल्क’
अल्मोड़ा की गीता बुढ़ाथोकी ने बताया वे 22 सालों से लगातार जौलजीबी मेले में जैकेट और बनियान बेचने के लिए आती हैं। एक साल बाद हुए मेले में व्यापार की अच्छी उम्मीद थी। मगर उम्मीद के मुताबिक सामान नहीं बिक रहा है। साथ ही प्रशासन की ओर से जो सुविधा शुल्क लिया गया है वह भी अधिक है।
चरखा-झूला न लगने से भी रौनक फीकी
गराली निवासी कुर्ती व्यापारी बहादुर पांडे ने बताया कि मेले मे झूला चरखा और सर्कस के न आने से भी मेले की रौनक फीकी रही। स्थानीय व्यापारी गजेंद्र सिंह पतियाल ने कहा मेला सांस्कृतिक मेले के नाम से पहचाना जाता है, लेकिन इस वर्ष सांस्कृतिक कार्यक्रम भी दिन में दो बजे शुरू हुए।
ऐसे में मेले में कम लोग ही पहुंचे। इसका असर व्यापार भी पड़ रहा है। कुछ अन्य व्यापारियों का कहना था कि ऑनलाइन खरीदारी का प्रचलन बढ़ने से अब लोग मेलों में आकर खरीदारी करने में अधिक दिलचस्पी नहीं लेते हैं। जबकि पहले मनोरंजन के साथ ही सामान खरीदने के लिए ही लोग मेलों में आते थे।
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