पहाड़ के फल उत्पादकों के लिए अब नया संकट खड़ा हो गया है। मौसम में बदलाव के कारण इस बार आम के पेड़ों में बौर समय से पहले आ गए थे, लेकिन अब इन बौरों में काला फंगस लग गया है। इससे फलों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। जिले के घाटी वाले इलाकों में कई परिवारों की रोजी-रोटी आम के फल बेचने से चलती है।
अस्कोट के देवल, खोलियागांव, बेड़ा में आम के बौरों में यह समस्या व्यापक रूप से दिख रही है। उधर, लोहाघाट, चल्थी और मुवानी घाटी में भी आम के बौरों में इसी तरह की समस्या सामने आ रही है। खोलियागांव के राम सिंह, देवल के लाल सिंह ने बताया कि आम के पेड़ों में इस बार एक माह पहले ही बौर आ गए थे। बौर तो काफी दिख रहे हैं, लेकिन एक-दो दिनों से इन बौरों का कुछ हिस्सा पाला पड़ने लगा है। इस कारण फल लगने की संभावना कम हो जाएगी। बताया गया कि पहाड़ों पर इस बार जाड़ों में बारिश और हिमपात कम हुआ था।
इस कारण जनवरी, फरवरी में तापमान बढ़ने लगा। आमतौर पर जाड़ों में अधिकतम तापमान 16 से 18 डिग्री सेल्सियस रहता है, लेकिन इस बार जनवरी और फरवरी में घाटी वाले इलाकों में अधिकतम तापमान 20 से 22 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था।
यह समस्या फंगस से पैदा हुई
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डा. आरके सिंह ने बताया कि आम के बौरों का काला पड़ना फंगस के कारण हुआ है। तापमान में यदि उतार-चढ़ाव हो तो बौरों में बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं। यह बैक्टीरिया बौरों के असली तत्व को समाप्त कर देता है। इससे बौर काले पड़ने लगते हैं। उन्होंने बताया कि तत्काल ऐसे बौरों में किसी भी प्रकार के कीटनाशक का स्प्रे कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिले के अन्य स्थानों से भी फल उत्पादक इसी तरह की समस्या बता रहे हैं। इसका सिर्फ कीटनाशक से स्प्रे ही समाधान है। उन्होंने कहा कि फल उत्पादकों को इसमें देरी नहीं करनी चाहिए।
जिले में यह हैं आम उत्पादक घाटियां
जिले में जौलजीबी, झूलाघाट, घाट, पनार, बगड़ीहाट, बरम, बंगापानी, मुवानी, थल, नाचनी घाटी में आम का उत्पादन बहुत होता है। इन घाटियों में कम से कम 500 लोग जुलाई, अगस्त में आम के फलों की बिक्री कर आजीविका चलाते हैं। इन घाटियों का कच्चा आम हल्द्वानी और रामनगर की मंडियों तक पहुंचता है, जबकि पके आमों की बिक्री आसपास की मार्केट में हो जाती है।