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भीमल और भांग के रेशों से बनाई खूबसूरत सजावटी मालाएं और झालरें

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भीमल, भांग के रेशों से मालाएं तैयार करती महिलाएं। - फोटो : PITHORAGARH
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पिथौरागढ़। नए प्रयोग कर लोगों को स्वरोजगार से जोड़ रही उत्तरापथ संस्था ने चारा पत्ती के काम आने वाले भीमल के पेड़ और भांग की पौध के रेशों से खूबसूरत सजावटी मालाएं और झालरें बनाने का काम शुरू किया है। 150 से 300 रुपये कीमत की इन मालाओं और झालरों को लोग हाथोंहाथ ले रहे हैं। ग्रामीण महिलाओं की इस खूबसूरत कारीगरी से 60 से अधिक परिवारों की आजीविका चल रही है।
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रिंगाल की राखियां और फूलदान सहित 150 से अधिक प्रकार के सामान बनाने के बाद उत्तरापथ संस्था ने अब भीमल के पेड़ और भांग के पौधों के रेशों से भी उत्पाद बनाने शुरू कर दिए हैं। इसके लिए संस्था की ओर से नियुक्त प्रशिक्षित हस्तशिल्पियों ने मुवानी और मुनस्यारी के 60 परिवारों को माला और झालर बनाने का प्रशिक्षण दिया। संस्था से जुड़ी महिला हस्तशिल्पियों ने प्रशिक्षण लेने के बाद झालर और मालाएं बनाने का काम शुरू कर दिया है। अब महिलाएं रेशों से आकर्षक मालाएं बनाने में दक्ष हो चुकी हैं। संस्था अन्य गांवों में भी महिलाओं को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण देंगी।
रेशों को सजाने में होता है प्राकृतिक रंगों का प्रयोग
भीमल और भांग के रेशों से मालाएं और झालरें बनाने में प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में जिस तरह से पर्यावरण के लिए खतरा बन चुके प्लास्टिक के सजावटी सामान से बाजार भरा पड़ा है, ऐसे में बेकार चली जाने वाली भीमल और भांग के रेशों का उपयोग पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा योगदान दे रहा है।
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रेशा हस्तशिल्प कार्यक्रम के तहत हो रहा उत्पादन
उत्तरापथ सेवा संस्था नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज, जीबी पंत पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान कोसी कटारमल और पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सहयोग से रिंगाल, बांस और रेशा हस्तशिल्प कार्यक्रम के तहत स्थानीय संसाधनों से सामग्री तैयार कर रही है। स्थानीय किसान पेड़-पौधों के रेशे स्वयं एकत्र करते हैं।
दिवाली पर हाथों हाथ बिकीं रेशों की मालाएं
पेड़-पौधों के रेशों से महिला हस्तशिल्पियों की ओर से निर्मित मालाओं और झालरों की बिक्री दिवाली पर भी जमकर हुई। परियोजना समन्वयक पंकज कार्की ने बताया कि मालाएं और झालरें पूरी तरह से हर्बल उत्पाद हैं। भविष्य में यह पर्यावरण संरक्षण में सहायक होंगी। ब्यूरो
कोट...
ग्रामीणों को हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके माध्यम से ग्रामीण अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकेंगे। स्थानीय संसाधनों के माध्यम से उत्पाद बनाने से संसाधनों का उपयोग तो हो ही रहा है, साथ ही स्वरोजगार के माध्यम से ग्रामीणों की आजीविका भी सुधर रही है। अधिक परिवारों को इसका लाभ दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। - राजेंद्र पंत, संस्थापक उत्तरापथ संस्था मुवानी, पिथौरागढ़।

भीमल और भांग के रेशों से बनाई गई मालाएं।- फोटो : PITHORAGARH

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