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Pithoragarh News: कला का बेजोड़ नमूना है बाणासुर किला

Fri, 17 Apr 2026 10:59 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
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लोहाघाट (चंपावत)। बाणासुर का किला एक ऊंची चोटी पर स्थित है। कहा जाता है कि किले का निर्माण बाणासुर नामक दैत्य ने किया था। श्री कृष्ण के पौत्र और प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री उषा के संबंध में एक रोचक कथा भी प्रचलित है। उषा अपनी सखी चित्रलेखा के माध्यम से अनिरुद्ध को यहां अपहृत कर लाई थी। ऐसी ही एक कहानी गढ़वाल में ऊखीमठ के संबंध भी भी है।
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जनश्रुतियां हैं कि देवासुर संग्राम भी यहीं हुआ था। एक अन्य किवदंती यह भी है कि सप्तमातृकाएं यहां गा रहीं थीं। बाणासुर ने उनका मनभावन गीत सुना तो वह अपने अस्त्र-शस्त्र यहीं रखकर बैठ गया। बाद में उसने यहीं मातृकाओं का मंदिर स्थापित किया।

किले की तलछंद योजना आयताकार है। 80 मीटर लंबाई और 20 मीटर चौड़ाई में निर्मित इस कोट के चारों कोनों पर बुर्ज बने हैं। किले का एक द्वार पश्चिम-दक्षिण कोने में और दूसरा उत्तर-पूर्व कोने के पास बना है।
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किले की दीवार में ऊपर के छोर पर 88 छिद्र बनाए गए हैं जो शस्त्रों के उपयोग के लिए बनाए गए हैं। मध्य में पक्का जलाशय है। कुंड से पकी ईटों के खंड भी प्राप्त हुए हैं। ईंटों का प्रयोग धरातल पर हुआ था। इस कुंड में जाने के लिए 26 सीढि़यां हैं। ।




किले के भीतर हैं आवासीय भवन

किले के भीतर पांच आवासीय भवन बनाए गए हैं। उत्तर पूर्व के द्वार के सन्मुख एक लघु कक्ष भी बना है। आवास गृहों की दीवारें 47 सेमी तक मोटी हैं। चिमनीयुक्त चूल्हों से सज्जित निवास समूह के फर्श पक्के हैं। पश्चिम की ओर एण्टका नामक पहाड़ी पर पुरातन मृदभांडों के अवशेष भी मिलते हैं।
किले पर खस जाति के मौर्य वंशीय सामंतों का आधिपत्य रहा। स्थानीय लोग इसे माराकोट के नाम से जानते हैं।





बालेश्वर महादेव मंदिर



चंपावत। नगर का बालेश्वर महादेव मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है। 13वीं शताब्दी में स्थापित बालेश्वर मंदिर खजुराहो शैली को खुद में समेटे हुए है। 10वीं-13वीं शताब्दी के बीच चंद वंश के राजाओं का स्थापित मंदिर वास्तुकला का अद्भुत नमूना है।
बालेश्वर मंदिर ने 1742 में रुहेलों का आक्रमण भी झेला है। तब की खंडित मूर्तियों को मंदिर परिसर में सहेजा गया है। रुहेलों ने इस भव्य मंदिर को खंडित करने का प्रयास तो किया लेकिन मजबूत पत्थर पर की गई नक्काशी पर उनके हथियार काम नहीं कर पाए।
शिल्प कला की दृष्टि से मंदिर बहुत महत्वपूर्ण है। हर मूर्ति भव्य और कलात्मक है। भगवान शिव के अलावा यहां मां भगवती, चंपा देवी, भैरव, गणेश, मां काली की मूर्तियां हैं।
मंदिर के महंत पवन गिरि ने बताया कि मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है। यहां पर होने वाले कार्य विभाग की देखरेख में होते हैं। यहां के दर्शन करने से काशी विश्वनाथ के बराबर फल मिलता है। महाशिवरात्रि पर महादेव के दर्शन करने से इच्छा फल की प्राप्ति होती है।
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