पिथौरागढ़। पहाड़ का प्रमुख फल माने जाने वाले नारिंग और माल्टा पर भी पलायन की मार पड़ी है। लोगों के गांव छोड़कर जाने से फल-पट्टियां पूरी तरह से समाप्त हो चुकी हैं। गिने-चुने गांवों में ही नारिंग और माल्टा के पेड़ बचे हैं। अब दुर्लभ हो चुका नारिंग इस समय पिथौरागढ़ बाजार में 60 से 80 रुपये तो माल्टा 30 रुपये किलो बिक रहा है।
पिथौरागढ़ का कनालीछीना विकासखंड नारिंग और माल्टा का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र रहा है। इसका उमरी, चौकी, गुड़ौली, दौला, सिंगाली, अस्कोट, नारायणनगर क्षेत्रों में बहुतायत उत्पादन होता था। बेड़ीनाग विकासखंड भी नारिंग के उत्पादन के लिए जाना जाता था। डीडीहाट के जौरासी, हचीला, हड़खोला, खोलियागांव में बगीचों में पेड़ इसके फलों से लदे रहते थे। इसके अलावा पिथौरागढ़ के चंडाक, बांस, नाकोट, गोरंग क्षेत्र में नींबू प्रजाति के फलों को खूब उत्पादन होता था। अब पुरानी फल पट्टियां लगभग सूख चुकी हैं।
कनालीछीना विकासखंड के उमरी गांव में अब माल्टा के पेड़ नजर नहीं आते हैं। चौकी गांव में भी फलों का उत्पादन कम हो गया है। गुड़ौली गांव में पुराने पेड़ सूख चुके हैं। अधिकतर ग्रामीणों के कृषि कार्य छोड़ने और नगरीय क्षेत्रों का रुख करने से नींबू प्रजाति के उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। पिछले एक दशक में नए बागान विकसित नहीं करने से नारिंग और माल्टा दुर्लभ हो गया है। जो गांव पहले टनों के हिसाब से नारिंग माल्टा की बिक्री करते थे, वहां के ग्रामीण बाजार से इन फलों केे खरीदकर खा रहे हैं।
नींबू प्रजाति के फल ठंडे इलाकों में होते हैं। हाल के वर्षों में तापमान में वृद्धि होने से इसके उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। जिन क्षेत्रों में नारंगी और माल्टा का उत्पादन होता है, उन क्षेत्र के किसानों को पौधे उपलब्ध कराए जाते हैं। फलों के अच्छे उत्पादन के लिए बागानों की देखभाल भी जरूरी होती है। -मीनाक्षी जोशी, मुख्य उद्यान अधिकारी, पिथौरागढ़