पिंडारी ग्लेशियर से निकली पिंडर नदी अब भले ही शांत बह रही हो, लेकिन हफ्ते भर पहले इसका रौद्र रूप रोंगटे खड़े कर रहा था। हाहाकार मचाती पिंडर मानों कह रही हो कि मेरा आंगन खाली करो। गत 16 जून से 20 तक पिंडर ने जो रूप दिखाया उससे हुई तबाही के अक्स थराली से कर्णप्रयाग तक नदी से सटी बस्तियों में देखे जा सकते हैं।
कहर ऐसा कि क्या खेत खलियान, तो क्या होटल मकान। जो चपेट में आया, पिंडर में समा गया। कई स्थानों पर मीलों सड़क भी पिंडर लील गई हो। मानो संदेश दिया हो कि मेरा आंगन खाली करो। नहीं तो मेरा ऐसा ही रूप सामने आएगा। 17 जून को पिंडर नदी ने जो रूप जो दिखाया उससे हर कोई हतप्रभ है। नगर के तकरीबन आधा दर्जन भवन पिंडर बहा ले गई तो 20 से अधिक जलमग्न हो गए थे।
पिंडर के इस उफान में कई गोदाम और कई परिवारों का सामान पानी के वेग के साथ ही बह गया। थराली से कर्णप्रयाग तक तकरीबन 50 किमी में पिंडर ने ऐसा तांडव मचाया कि नौली, कुलसारी और अन्य गांवों के सैकड़ों नाली उपजाऊ भूमि हो या थराली और नारायणबगड़ बाजार में कई दुकानें सिमली में दो आवासीय भवन पिंडर लील गई।
कुलसारी, कालजाबर, नारायणबगड़, नलगांव सहित अन्य स्थानों पर कई किमी सड़क पिंडर के क्रोध का शिकार हो गई है। लेकिन जानकारों का मानना है कि नदी पर तबाही बाढ़ से कम और मानवीय भूलों से अधिक हुई है। बाढ़ के बाद पिंडर ने अपना आंगन खाली करने काम किया है। नगरीय बस्तियों में व्यवसायिक होड़ के चलते नदियों में बहुमंजिला भवन खड़े कर दिए हैं।
अतिक्रमण्ा से बढ़ रहा ख्ातरा
गंगा सेवा समिति के उद्धव प्रसाद देवली के अनुसार नदियों से छेड़ छाड़ आपदाओं का रूप ले रही है। नदी बचाओ अभियान के सुरेश भाई के अनुसार उत्तरकाशी, कर्णप्रयाग और श्रीनगर चाहे अन्य शहर जहां नदियों में अतिक्रमण कर इमारतें खड़ी हो रही है, नई मुसीबतों को दावत दे रही हैं।
इनकी सुरक्षा के लिए प्राइवेट सहित सरकारी स्तर पर कोई प्रयास तो दूर इस प्रकार के शहरों में निर्माण का कोई मास्टर प्लान नहीं है, जबकि हिमालयी प्रदेश की नदियों में अचानक बाढ़ का अपना एक इतिहास रहा है। यही वजह है कि इन नदियों के तटों पर नुकसान अधिक होता है। इधर डा. हरपाल सिंह नेगी के अनुसार जब सत्तर के दशक में पिंडर में बाढ़ आई थी तब भी ऐसी स्थितियां नहीं बनी थी।