पौड़ी। उत्तराखंड के माध्यमिक शिक्षा विभाग में वरिष्ठता व पदोन्नति का आधार रहा शासनादेश 2158 विभाग व शासन से गायब हो गया है। सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत यह खुलासा हुआ है। इस शासनादेश से वर्ष 2001-02 से 2007-08 तक एलटी से प्रवक्ता पद पर शिक्षकों को तदर्थ पदोन्नति मिली थी। उक्त शिक्षकों को मौलिक पदोन्नति 2010 में मिली। जबकि उन्हें वरिष्ठता शासनादेश 2158 के आधार पर तदर्थ पदोन्नति से प्रदान की गई है। जिससे वर्ष 2005-06 में सीधी भर्ती से नियुक्त प्रवक्ता पद के शिक्षकों की वरिष्ठता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।उत्तराखंड के माध्यमिक शिक्षा विभाग ने शासनादेश संख्या 2158/मा सं वि /2001 16 जून 2001 जारी किया था। जिसके तहत एलटी से प्रवक्ता पद पर शिक्षकों को तदर्थ पदोन्नति दी गई थी। इस शासनादेश से वर्ष 2001-02 से लेकर वर्ष 2007-08 तक लगभग एक हजार एलटी शिक्षकों को प्रवक्ता पदों पर तदर्थ पदोन्नति दी गई थी। जिन्हें मौलिक पदोन्नति 6 अगस्त 2010 में दी गई थी। लेकिन विभाग ने उक्त शिक्षकों की वरिष्ठता तदर्थ पदोन्नति के आधार पर तय कर दी थी। जिससे वर्ष 2005-06 में सीधी भर्ती से नियुक्त करीब 1200 प्रवक्ता पद के शिक्षकों की वरिष्ठता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। जिसको लेकर शिक्षक लगातार विभाग से तदर्थ पदोन्नति पाने वाले शिक्षकों की वरिष्ठता मौलिक पदोन्नति से तय किए जाने की मांग कर रहे हैं। इस बीच वरिष्ठता व पदोन्नति का आधार रहे शासनादेश 2158 को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगा गया। लेकिन विभाग व शासन ने जवाब में उक्त शासनादेश के उपलब्ध नहीं होने की पुष्टि की है। कोटद्वार निवासी आरटीआई कार्यकर्ता अरुण गौड़ ने बताया कि शासनादेश संख्या 2158 के संदर्भ में विभाग व शासन से आरटीआई में इस शासनादेश की प्रति मांगी तो, विभाग व शासन द्वारा जबाब मिला कि यह शासनादेश उपलब्ध नहीं है। जबकि यह शासनादेश इतना महत्वपूर्ण है कि इससे एलटी से प्रवक्ता के पदों पर शिक्षकों को तदर्थ पदोन्नति मिलने के साथ ही वरिष्ठता का आधार भी माना गया है। कहा, अगर शासनादेश गायब है, तो मामले की जांच की जानी चाहिए। चयनित प्रवक्ता दीपक गौड़ ने बताया कि विसंगतिपूर्ण वरिष्ठता सूची पर वर्ष 2014 में हाईकोर्ट स्टे लगा चुका है। सवाल यह है कि शासनादेश जारी हुआ भी है कि नहीं। जारी हुआ, तो शिक्षा विभाग से लेकर वित्त, कार्मिक, न्याय विभाग में इस शासनादेश की प्रति जरूर होती। प्रवक्ता कल्याण समिति ने सीएम से इस शासनादेश की उच्चस्तरीय जांच किए जाने की मांग की है। इन दिनों शिक्षा विभाग का यह शासनादेश सुर्खियां बटोर रहा है। शिक्षकों के साथ ही लोगों के बीच भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
प्रथम पीसीएस बैच को अदालत से मिली थी राहत
चयनित प्रवक्ता युगजीत सेमवाल ने बताया कि उत्तराखंड के प्रथम पीसीएस बैच को भी विसंगतिपूर्ण वरिष्ठता सूची की खामियाजा भुगत चुका है। जिन्हें देश की शीर्ष अदालत से राहत मिली थी। बताया कि पीसीएस बैच के अधिकारियों व तहसीलदार से एसडीएम पद पर तदर्थ पदोन्नति प्राप्त अधिकारियों के कनिष्ठ माना गया था।
क्या है वरिष्ठता निर्धारण का नियम 7 व 8
वरिष्ठता निर्धारण नियमावली 2002 के अनुसार प्रवक्ता के पद पर नियुक्ति सीधी भर्ती व पदोन्नति के माध्यम से होती है। विभाग में वरिष्ठता का निर्धारण नियम 7 व 8 के माध्यम से होता है। भर्ती का स्रोत अलग-अलग होने पर नियम 8 और स्रोत एक ही होने पर वरिष्ठता का निर्धारण नियम 7 से होता है। लेकिन इसमें विभाग द्वारा नियम 7 से वरिष्ठता निर्धारण कर नियम विरुद्ध कार्य है।
- शिक्षा विभाग ने वरिष्ठता निर्धारण में घोर लापरवाही की है। जिसका खामियाजा सीधी भर्ती से नियुक्त शिक्षकों को उठानी पड़ रही है। मामला अदालत में विचाराधीन है। शिक्षा मंत्री कह रहे हैं कि वाद वापस लिया जाए। शिक्षकों का दावा है कि विभाग वरिष्ठता निर्धारण नियमानुसार कर दे, शिक्षक केस वापस लेने को तैयार हैं। -मुकेश बहुगुणा, अध्यक्ष प्रवक्ता वेलफेयर सोसाइटी उत्तराखंड।
- शिक्षकों के एलटी से प्रवक्ता पद पर तदर्थ पदोन्नति संबंधित शासनादेश के गायब होने के बात सामने आ रही है। जिसको दिखवाया जा रहा है। शासनादेश के विभाग में नहीं होने का सवाल ही नहीं उठता है। वह विभाग के ही पास होगा। -झरना कमझान, शिक्षा महानिदेशक उत्तराखंड