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ऋषभ की लगन के आगे हारी विपरीत परिस्थितियां

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यदि दृढ़ निष्ठा और लगन हो, तो मेहनत के आड़े अभाव नहीं आते हैं। इसे साबित कर दिखाया है जलेथा निवासी ऋषभ चौहान ने। कक्ष सेवक के बेटे ने बीटेक और एमटेक करने के बाद भाभा एटमिक रिसर्च सेंटर बार्क में साइंटिफिक अफसर बनने का सपना सच करके दिखाया।
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ऋषभ चौहान गुदड़ी का लाल साबित हुआ है। पौड़ी जिले के जलेथा गांव निवासी ऋषभ के पिता जिला अस्पताल रुद्रप्रयाग में वार्ड ब्वाय (कक्ष सेवक) के पद पर कार्यरत थे। माता गृहणी हैं। चार साल पूर्व पिता का स्वर्गवास हो गया। ऋषभ की जूनियर हाईस्कूल तक की शिक्षा जलेेथा और आसपास के विद्यालय में हुई। इसके पश्चात उनकी हाईस्कूल व इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई सरस्वती विद्या मंदिर बेलणी रुद्रप्रयाग से हुई। बिना कोचिंग उनका एनआईटी उत्तराखंड में चयन हो गया। पैसेे की तंगी की वजह से श्रीनगर में उसके लिए कमरा लेेना संभव नहीं था। इसलिए उसने श्रीनगर से करीब पांच किमी दूर अपने ननिहाल मलेथा को ठिकाना बनाया। वर्ष 2017 में एनआईटी से पासआउट होने के बाद उसका चयन आईआईटी दिल्ली में हो गया। वर्ष 2020 में उसने एमटेक करते हुए अगली मंजिल पर निशाना साधा, जिसमें वह पहले प्रयास में सफल रहा। ऋषभ का चयन बार्क में साइंटिफिक अफसर के पद पर हो गया है। ऋषभ के रिश्ते के ताऊ मेडिकल कॉलेज श्रीनगर के प्राचार्य प्रो. सीएम रावत बताते हैं कि साबित किया है कि मेहनतकशों के आड़े विपरीत परिस्थितियां कभी नहीं आती हैं। ऋषभ अपना प्रेरणास्रोत अपनी दादी मालती देवी और चाचा बृजमोहन चौहान को मानते हैं।
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