उत्तराख्ांड में आपदा-बचाव कार्य में सेना और प्रशासन के बीच तालमेल न होने से दिक्कतें आ रही हैं। प्रशासन के अंदरूनी स्तर पर भी जरूरी तालमेल नजर नहीं आता। ऐसा नहीं कि काम नहीं हो रहा पर वर्क प्लानिंग में देरी और हीलाहवाली हो रही है।
राहत शिविरों में पहुंचने वाले यात्रियों को यह पता नहीं होता कि वे किससे और कहां बात करें। सेना के जवान अपनी तरफ से संभालने की कोशिश करते हैं, तो प्रशासन भी उन्हीं यात्रियों को अपनी देख-रेख में गंतव्य तक पहुंचाने की कोशिश करता है। इस पूरी प्रक्रिया में अव्यवस्था बनी रहती है।
संचार, संवाद, परिवहन की अंदरूनी समस्याओं से यात्रियों को दिक्कत तो हैं ही स्थानीय लोग भी परेशानी झेल रहे हैं। आपदा के इस दौर में लोगों को यह पता नहीं चल रहा है कि उन्हें अपनी समस्या को लेकर किस अधिकारी से बात करनी है। सेना के लोग अपने कामों में प्रशासनिक दखल पसंद नहीं कर रहे हैं, लेकिन कुछ मामले ऐसे है जिन्हें प्राशसनिक स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है।
तालमेल का आभाव इस तरह है कि आपदा राहत के लिए जो सामग्री आ रही है, वह व्यवस्थित रूप से वितरित नहीं हो पा रही है। प्रशासन की लापरवाही से इसे ठीक तरह से स्टोर नहीं किया जा रहा है। यहां तक देखा गया है कि गैर जरूरतमंद भी इसका फायदा उठा रहे हैं।
प्रशासन के पास नहीं रूट मैप
जरूरत की सामग्री सुविधाजनक स्थानों तक तो पहुंच रही है, लेकिन दूरदराज के गांव इससे वंचित हैं। प्रशासन के पास कोई रूट मैप भी नहीं कि किस तरह से सामग्री को पहुंचाया जाए। प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाओं के बीच भी समन्वय नहीं हो रहा है। प्रशासन ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की है कि एनजीओ को साथ लेकर राहत काम किया जा सके।
केंद्रीय मंत्री हरीश रावत आपदा प्रभावित क्षेत्रों के भ्रमण के दौरान एक राहत शिविर में पहुंचे तो इन तमाम चीजों को लेकर लोगों ने उनसे शिकायत की। ऐसे कठिन समय में मौसम विभाग के साथ तालमेल बनाने की सख्त जरूरत थी। खासकर यह देखते हुए कि हाल की तबाही से पहले भी दून स्थित मौसम विभाग ने अतिवृष्टि की भविष्यवाणी कर दी थी।
लेकिन इस पर गौर नहीं किया गया। फिर एक बार मौसम विभाग जुलाई पहले हफ्ते में ऐसी ही आशंका जता रहा है, लेकिन शासन-प्रशासन स्तर पर इसे लेकर कोई तैयारी नजर नहीं आती।