नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड यूपीसीएल में प्रमोशन और सीधी भर्ती से नियुक्त सहायक अभियंताओं की अंतर-सेवा वरिष्ठता के विवाद पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए यूपीसीएल की ओर से तैयार अंतिम वरिष्ठता सूची को सही ठहराते हुए इसके खिलाफ दायर तीनों याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार अनुज अग्रवाल व अन्य, सुनील कुमार पोखरियाल व अन्य सहित रूपेश कुमार नठैला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि मामला वर्ष 2008-09 की भर्ती प्रक्रिया को है। इस दौरान सहायक अभियंता के पदों पर पदोन्नति और सीधी भर्ती दोनों माध्यमों से नियुक्तियां की गई थीं। पदोन्नति के लिए पात्र कनिष्ठ अभियंताओं की संख्या कम होने के कारण उनके लिए आवश्यक अर्हकारी सेवा अवधि में 50 प्रतिशत की छूट भी दी गई थी।
विवाद मुख्य रूप से प्रमोशन से आए अभियंताओं और सीधी भर्ती से नियुक्त अभियंताओं के बीच वरिष्ठता तय करने को लेकर था। यूपीसीएल ने वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए वरिष्ठता विनियम, 1998 के विनियम 8(3) में निर्धारित रोटा-कोटा चक्रानुक्रम व्यवस्था को आधार बनाया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठता सूची को चुनौती देते हुए विभिन्न तर्क दिए गए थे। पूर्व में इस मामले में न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश और प्रशिक्षण अवधि को नियमित सेवा में शामिल किए जाने के प्रश्न पर भी पक्षकारों के बीच विवाद रहा। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि वरिष्ठता विनियम, 1998 लागू होने के बाद वरिष्ठता निर्धारण में उसके प्रावधान प्रभावी होंगे। न्यायालय ने कहा कि एक ही चयन प्रक्रिया में सीधी भर्ती और पदोन्नति से नियुक्त अभ्यर्थियों की अंतर-सेवा वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए विनियम 8(3) में निर्धारित व्यवस्था का पालन किया जाना है। खंडपीठ ने माना कि भर्ती प्रक्रिया के किसी एक माध्यम में प्रशासनिक देरी होने मात्र से वैधानिक रोटा-कोटा व्यवस्था समाप्त नहीं हो जाती।
न्यायालय ने निष्कर्ष दिया कि यूपीसीएल द्वारा पदोन्नत और सीधी भर्ती से नियुक्त सहायक अभियंताओं की अंतर-सेवा वरिष्ठता वरिष्ठता विनियम, 1998 के विनियम 8(3) के अनुसार निर्धारित करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।