नैनीताल हाईकोर्ट ने आरटीआई मामलों में वर्चुअल पेशी की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि सूचना आयोग के समक्ष वकील या प्रतिनिधि के वर्चुअल पेश होने का कोई निहित अधिकार नहीं है, क्योंकि वहां कानूनी प्रशिक्षण अनिवार्य नहीं है।
नैनीताल हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार कार्यवाही में अधिकृत प्रतिनिधि वकील या अन्य व्यक्ति को वर्चुअल या हाइब्रिड मोड के जरिए पेश होने का कोई अधिकार नहीं होने के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई के बाद याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सूचना आयोग के समक्ष होने वाली कार्यवाही को सरल, त्वरित और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए डिजाइन किया गया है ताकि कानूनी जटिलताओं को कम किया जा सके। इसमें कानूनी रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति की सेवाएं अनिवार्य नहीं हैं। इसलिए, सूचना आयोग के सामने वकील या अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से वर्चुअल पेशी का कोई निहित अधिकार नहीं बनता है।
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न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार ने याचिकाकर्ता राजेश पांडे ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर राज्य सूचना आयोग के एक आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि आरटीआई नियमावली, 2005 के अनुसार अपीलकर्ता/शिकायतकर्ता कार्यवाही में किसी अन्य व्यक्ति या अधिकृत प्रतिनिधि की सहायता ले सकता है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि उसके अधिकृत प्रतिनिधि को हाइब्रिड मोड के माध्यम से भाग लेने की अनुमति नहीं दी जा रही है, जो कि अवैध है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सूचना आयोग के समक्ष होने वाली कार्यवाही को सरल, त्वरित और नागरिक-केंद्रित बनाने के लिए डिजाइन किया गया है ताकि कानूनी जटिलताओं को कम किया जा सके। इसमें कानूनी रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति की सेवाएं अनिवार्य नहीं हैं। इसलिए, सूचना आयोग के सामने वकील या अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से वर्चुअल पेशी का कोई निहित अधिकार नहीं बनता है।