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सत्तर किमी का सफर, सात सौ खर्च और फिर होता है अल्ट्रासाउंड

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गरमपानी। युवा हो चुके उत्तराखंड में आज भी लोग बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं का दंश झेल रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज आज भी अल्ट्रासाउंड और एक्सरे कराने के लिए 70 किमी का सफर तय करने को मजूबर हैं। बीमारी झेल रहे मरीज को दो सौ रुपये किराया खर्च करना पड़ता है और फिर तीन सौ रुपये एक्सरे और पांच सौ रुपये अल्ट्रासाउंड के लिए देने पड़ते हैं। एक अल्ट्रासाउंड या एक्सरे मरीज पांच से सात सौ रुपये देने पड़ते हैं। मंत्री, सांसद और विधायकों ने सिर्फ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे किए मगर इनको पूरा करने की जहमत नहीं उठाई। सुयालबाड़ी का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और गरमपानी सीएचसी की स्वास्थ्य सुविधाएं राम भरोसे चल रही है।
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अस्पताल में एक्सरे और लैब टेक्नीशियन न होने से मरीजों को वापस लौटना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर मौजूद संसाधनों में मरीजों को बेहतर उपचार दिया जा रहा है। - डॉ. सत्यवीर सिंह, प्रभारी चिकित्साधिकारी, सुयालबाड़ी सीएचसी
विशेषज्ञ डॉक्टरों
गरमपानी। सुयालबाड़ी के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्वास्थ्य सुविधाएं बेहद खराब है। अस्पताल में वर्तमान समय में चार डॉक्टर तैनात है। वहीं अस्पताल में सर्जन, फिजीशियन, बाल रोग विशेषज्ञ के पद रिक्त पड़े हैं। साथ ही अल्ट्रासाउंड और एक्सरे के अभाव में मरीजों को 50 से 70 किमी दूर का सफर तय कर अन्य अस्पतालों में रुख करना पड़ रहा है। लैब टेक्नीशियन, डेंटल चेयर सफाई कर्मी न होने से मरीज परेशान होते हैं। अस्पताल में 20 मरीज ओपीडी में आते हैं। अस्पताल में दवाएं मिलती हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गरमपानी में नौ डॉक्टर हैं। सर्जन, फिजीशियन, स्त्री रोग विशेषज्ञ के पद रिक्त होने से मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में रोजाना 70 ओपीडी और 6 से 10 इमरजेंसी के मरीज उपचार के लिए आते हैं। हालांकि अस्पताल में अल्ट्रासाउंड, एक्सरे मशीन और तमाम प्रकार की लैब जांचे होने से नैनीताल और अल्मोड़ा जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को परेशान नहीं होना पड़ता है।
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कई गांवों को जोड़ता है सुयालबाड़ी का सीएचसी
गरमपानी। सुयालबाड़ी का सीएचसी ग्रामीण क्षेत्रों के कई ग्रामसभाओं से जुड़ा हुआ है। इसमें नैनीपुल, क्वारब, मनरसा, सुयालबाड़ी, कमोली, काकड़ीघाट, चाफा, चोपड़ा, खीनापानी, डीना, गंगरकोट आदि गांव के लोग उपचार के लिए अस्पताल पहुंचते हैं। लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में मरीजों को हल्द्वानी, नैनीताल, बरेली और दिल्ली के अस्पतालों में भटकना पड़ता है।
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