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गांधी जी के नमक सत्याग्रह में उत्तराखंड की रही भूमिका

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अल्मोड़ा पहुंचे महात्मा गांधी के साथ देश भक्त मोहन जोशी। - फोटो : ALMORA
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हल्द्वानी। महात्मा गांधी के साथ नमक सत्याग्रह आंदोलन में कुमाऊं के तीन सेनानी ज्योति राम, भैरव दत्त और गोरखा खड़क बहादुर भी शामिल थे। इन्होंने साबरमती आश्रम जाकर डांडी आंदोलन में भाग लिया और नमक डिपो पर धरना भी दिया।
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12 मार्च 1930 से शुरू हुई 24 दिन की डांडी यात्रा में कुमाऊं से ज्योतिराम कांडपाल भी शामिल थे जो गांधी जी के साथ जेल चले गए। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. अजय सिंह रावत की उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास में जिक्र है कि अध्यापक ज्योति राम कांडपाल ने आंदोलन के लिए पद से इस्तीफा भी दे दिया था। सरोजनी नायडू के नेतृत्व में गुजरात में धरासाणा नामक स्थान के नमक डिपो पर धरना देने वाले वह उत्तराखंड के एकमात्र स्वयं सेवक रहे। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उन्हें एक साल की सख्त जेल और 200 रुपया जुर्माना तथा कुर्की भी हुई।
नैनीताल में निकला था नमक आंदोलन के लिए जुलूस
गांधी जी ने सक्रिय कार्यकर्ता शांति लाल त्रिवेदी को आंदोलन के लिए कुमाऊं भेजा। उनके प्रयास से कौसानी के पास चनौदा में गांधी आश्रम की स्थापना की गई। डॉ. हीरा सिंह भाकुनी के अनुसार चनौदा का यही आश्रम और उसके आसपास के गांव 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन जागृति के प्रमुख केंद्र बने रहे। 27 मई 1930 को बदरीदत्त पांडे ने 6 हजार लोगों की उपस्थिति में प्रभावशाली व्याख्यान दिया और नमक बेचा। इससे पहले 21 मई 1930 को गोविंद बल्लभ पंत, हर्ष देव ओली, इंद्र सिंह नयाल के नेतृत्व में नैनीताल मालरोड में नमक आंदोलन को लेकर जुलूस निकाला गया। 23 मई को गोविंद बल्लभ पंत ने मल्लीताल रामलीला मैदान में 25 मई को नमक बनाए जाने की घोषणा की लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद इंद्र सिंह नयाल ने सभा आयोजित कर नमक बेचा और वह भी गिरफ्तार हो गए। बाद में बद्रीदत्त पांडे और कृष्णानंद जोशी नैनीताल आए और आंदोलन की कमान संभाली।
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अल्मोड़ा में झंडा सत्याग्रह और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. अजय रावत बताते हैं कि अल्मोड़ा में भी नमक सत्याग्रह हुआ मगर वहां इसने झंडा सत्याग्रह का रूप धारण कर लिया। चार मई 1930 को नवयुवकों ने राष्ट्रीय ध्वज लेकर जुलूस निकाला। इसके बाद नंदा देवी मंदिर प्रांगण में मोहन जोशी की अध्यक्षता में विराट सभा हुई। शांति लाल त्रिवेदी ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का प्रतिज्ञा पत्र पढ़ा और जनता ने इसमें सहर्ष हस्ताक्षर भी किए। फिर 25 मई 1930 को सर्वसम्मति से अल्मोड़ा नगरपालिका भवन में राष्ट्रीय झंडा फहराने का निर्णय लिया गया।
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