कार्बेट पार्क के टाइगर बचाने के नाम पर खिलवाड़ हो रहा है। कार्बेट पार्क के लिए टाइगर स्पेशल प्रोटेक्शन फोर्स बननी है, पर हमारे साहब लोग कैसे फोर्स (मुख्य रूप से कर्मचारियों की भर्ती) बने यह तय नहीं कर पा रहे हैं, जबकि संसाधन से लेकर आर्थिक मदद तक देने को केंद्र का नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथारिटी तैयार है। अब बताया जा रहा है कि फोर्स के लिए नए सिरे से प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। दावा है कि इस बार वाइल्ड लाइफ बोर्ड की मीटिंग में सभी बातों पर सहमति बन गई है।
करीब पांच साल पहले कार्बेट पार्क के बाघों को बचाने के लिए स्पेशल फोर्स बनाने की बात हुई। एनटीसीए भी हर तरह की मदद को तैयार था, पर इतने सालों में फोर्स बनकर तैयार नहीं हो सकी। हर बार मीटिंग होती है, कागजों की दौड़ होती है, कुछ न कुछ अड़चन लगती रहती है और कहानी आगे बढ़ जाती है। अब बताया जा रहा है स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड की हाल में मीटिंग हुई। इसमें इस फोर्स का मुद्दा उठा। अब पुराने प्रस्ताव में कुछ बदलाव कर नया जैसा प्रस्ताव बनाया जाएगा।
पहले फोर्स के लिए करीब सवा सौ कर्मी मिलने वाले थे, उनको वन विभाग के हिसाब से समायोजित करना था, पर इतने समय बाद तय हो पाया कि वह अतिरिक्त कर्मी (एडिशनल फोर्स) हाेंगे। हालांकि इस बारे में अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। कार्बेट पार्क निदेशक समीर सिन्हा कहते हैं कि कुछ पुराने प्रस्ताव में बदलाव कर नई बातों को जोड़ा जा रहा है।
निदेशक का पद जरूर अपग्रेड होता रहा
बाघ सुरक्षा एवं फोर्स का जो भी मुद्दा हो, लेकिन अफसरों के पद और काम नहीं रुकते। इसका उदाहरण खुद ही कार्बेट निदेशक का पद है। पहले निदेशक के पद का काम डीएफओ स्तर के अधिकारी से चल जाता था। बाद में यहां पर वन संरक्षक स्तर के अधिकारी की तैनाती होने लगी। इसके बाद मुख्य वन संरक्षक स्तर (सीसीएफ) के अधिकारी को तैनात कर दिया गया। यह क्यों और कैसे हुआ, इसे लेकर विभाग में ही खूब चर्चा होती रहती है। बहरहाल, उस हिसाब से सीसीएफ के बाद सीएफ और डीएफओ होना चाहिए, लेकिन बीच का पद खाली ही रखा गया।