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मुनाफाखोरी: थोक मंडी में आलू 17 तो फुटकर में बेच रहे 30

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प्रतीकात्मक फोटो।
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हल्द्वानी। थोक मंडी में आलू, प्याज और अन्य सब्जियों की आवक में कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद फुटकर सब्जी विक्रेता जमकर मुनाफा कमा रहे हैं। हाल यह है कि थोक मंडी में बुधवार को आलू के थोक भाव 17 रुपये किलो रहे, लेकिन फुटकर में विक्रेताओं ने यही आलू 13 रुपये मुनाफा कमाकर 30 रुपये किलो बेचा। प्याज का थोक भाव 21 रुपये किलो था, जो फुटकर में 35 से 40 रुपये किलो तक जनता ने खरीदा।
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लॉकडाउन के बीच सब्जियों की पर्याप्त आपूर्ति को मंडी समिति ने ठोस इंतजाम किए हैं। आढ़तियों से लेकर काश्तकारों को आवागमन के लिए पास जारी किए गए हैं। यही वजह है कि पहाड़ एवं मैदानी क्षेत्रों से आलू, प्याज के साथ ही सब्जियां बड़ी मात्रा में हल्द्वानी थोक मंडी में पहुंच रही हैं। मंडी अध्यक्ष मनोज साह और मंडी सचिव विश्वविजय सिंह देव आवक और थोक भावों पर लगातार निगाह रखे हुए हैं।
थोक मंडी में तो सब्जियों के भाव काबू में हैं, लेकिन फुटकर विक्रेता जमकर मुनाफा कमा रहे हैं। थोक मंडी से बाहर निकलते ही सब्जियों के दाम डेढ़ गुना तक बढ़ा दिए जाते हैं। ठेले और टुकटुक पर सब्जी बेचने वाले अधिक मुनाफाखोरी कर रहे हैं। पिछले दिनों एसडीएम की ओर से फुटकर सब्जियों के रेट भी तय किए थे, मगर उसका पालन नहीं हो रहा है।
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मंडी से बाहर सब्जी विक्रेताओं पर मंडी समिति का कोई अंकुश नहीं होता। मंडी समिति केवल थोक मंडी परिसर में मुनाफाखोरी या कालाबाजारी न हो, इस पर निगरानी अवश्य रखती है। आढ़तियों और थोक व्यवसायियों को आगाह किया जा चुका है कि अगर किसी ने कालाबाजारी की तो डीएम के निर्देशानुसार सख्त कार्रवाई होगी।
- विश्वविजय सिंह देव, सचिव मंडी समिति हल्द्वानी
मंडी में मजूदरों की कमी से आढ़ती परेशान
थोक सब्जी एवं गल्ला मंडी में इन दिनों मजदूरों की कमी से आढ़ती काफी परेशान हैं। लॉकडाउन के चलते बड़ी संख्या में मजदूर अपने घरों को जा चुके हैं। गल्लामंडी के व्यवसायी एवं व्यापारी नेता विपिन गुप्ता कहते हैं कि मंडी में बड़ी संख्या में बिहार और नेपाल के मजदूर काम करते थे, इनमें से बहुत से मजदूर लॉकडाउन होते ही अपने घरों को चले गए। इससे माल लोडिंग और अनलोडिंग करने में समस्या आ रही है। आलू फल आढ़ती व्यवसायी एसोसिएशन के अध्यक्ष जीवन सिंह कार्की कहते हैं कि मंडी में काम करने वाले मजदूर घरों को वापस जाने के कारण कई समस्याएं आ रही हैं। थोक मंडी में स्थानीय लोकल मजदूरों की संख्या बहुत कम है।
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